उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई के बीच सोमवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट में अहम सुनवाई नहीं हो सकी। पंचायत चुनाव और ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर लंच के बाद सुनवाई होनी थी, लेकिन बेंच के नहीं बैठने के कारण मामला आगे नहीं बढ़ सका। अब इन याचिकाओं पर अगले सप्ताह सुनवाई होने की उम्मीद है। हाई कोर्ट इस मामले से जुड़ी कुल नौ याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इनमें समय पर पंचायत चुनाव कराने की मांग के साथ ग्राम पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है।
नौ याचिकाओं पर एक साथ हो रही सुनवाई
पंचायत चुनाव से जुड़े मामले में चार जनहित याचिकाएं भी दाखिल की गई हैं। चीफ जस्टिस के आदेश पर इन याचिकाओं को लखनऊ बेंच से इलाहाबाद हाई कोर्ट की प्रधान पीठ में भेजा गया है। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही है। याचिकाओं में उत्तर प्रदेश सरकार के 25 मई के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासकों की नियुक्ति का रास्ता साफ हुआ था। इससे पहले 13 मार्च को अदालत ने पंचायत चुनाव 2026 को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग से चुनाव की विस्तृत रूपरेखा मांगी थी। कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग आयोग को भी छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था।
कोर्ट ने वरिष्ठ वकील को बनाया एमिकस क्यूरी
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता विजय कुमार सिंह को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। एमिकस क्यूरी यानी अदालत के सहयोगी के तौर पर वरिष्ठ वकील इस मामले में कानूनी पहलुओं को समझने और कोर्ट की मदद करने का काम करेंगे। पंचायत चुनाव को लेकर दाखिल याचिकाओं में समय पर चुनाव कराने और प्रशासकों की नियुक्ति से जुड़े कई सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में मामले की अगली सुनवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर पहले ही राजनीतिक और कानूनी चर्चा तेज है। अब सभी की नजर अगले सप्ताह होने वाली सुनवाई पर है। अदालत के अगले आदेश से यह स्पष्ट हो सकता है कि पंचायत चुनाव की प्रक्रिया को लेकर आगे क्या दिशा तय होती है और प्रशासकों की नियुक्ति के मामले में क्या रुख सामने आता है।
