वैश्विक बाजार में एक बार फिर भूचाल आ गया है क्योंकि ईरान और अमेरिका के बीच सुलगता संघर्ष दोबारा भड़क उठा है। इस भू-राजनीतिक तनाव का सबसे बुरा असर कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई पर पड़ा है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसका भाव उछलकर सीधे 105 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। जानकारों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो ऊर्जा संकट पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है।
भारत पर मंडराया संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की बाधा
दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शुमार भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि भारत की एक बहुत बड़ी ऊर्जा सप्लाई दुनिया के सबसे संवेदनशील मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से होकर गुजरती है। फरवरी के आखिर से जारी इस तनातनी ने पिछले कुछ महीनों में भारत के घरेलू बाजार को भी प्रभावित किया था, जब मई के महीने में लगातार चार बार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ानी पड़ी थीं।
क्या महंगे होंगे पेट्रोल और डीजल? सरकार की तैयारी
आम जनता के मन में यह सवाल सबसे बड़ा है कि क्या अब ईंधन फिर महंगा होगा? राहत की बात यह है कि भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं है, बल्कि वह कई देशों से कच्चे तेल का आयात करता है। इसके अलावा, देश में ईंधन का पर्याप्त रणनीतिक भंडारण मौजूद है, जिससे सरकार इस वैश्विक झटके को काफी हद तक नियंत्रित करने की पूरी तैयारी में है।
कमजोर हुआ रुपया और तेल कंपनियों की मुश्किलें
कच्चे तेल की कीमतों में आए इस भारी उछाल से केवल ईंधन बाजार ही नहीं, बल्कि भारतीय मुद्रा पर भी दबाव साफ दिखने लगा है। अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने के रुख के बीच भारतीय रुपया 0.2 फीसदी लुढ़ककर 95.30 प्रति डॉलर के स्तर पर आ गया है, जो पिछले 10 दिनों में इसका सबसे निचला स्तर है। इस दोहरी मार से तेल विपणन कंपनियों को भी भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
