उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ पुलिस का ‘एक्शन मोड’ एक बार फिर देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। गाजीपुर में विनीत राय हत्याकांड के मुख्य आरोपी कमलेश के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद सूबे की सियासत में भूचाल आ गया है। इस एनकाउंटर को लेकर विपक्ष जहां एक बार फिर योगी सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है, वहीं मृतक के परिजनों ने भी पुलिस की इस थ्योरी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस एक घटना ने यूपी में एनकाउंटर की राजनीति को फिर से गरमा दिया है, जहां एक तरफ इसे कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने का दावा बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ विरोधी दल इसे जाति और धर्म के चश्मे से देखकर सरकार को घेरने में जुट गए हैं।
मुठभेड़ के आंकड़ों का ‘जातीय गणित’ और सियासी घमासान
उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा जारी आंकड़ों और मीडिया रिपोर्ट्स पर नजर डालें, तो मार्च 2017 से लेकर सितंबर 2024 के बीच कुल 207 अपराधी पुलिस मुठभेड़ में ढेर किए जा चुके हैं। विपक्ष का आरोप है कि इन कार्यवाहियों में खास समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन आंकड़ों की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। इस पूरी अवधि में मारे गए अपराधियों में 67 मुस्लिम, 20 ब्राह्मण, 18 ठाकुर, 16 यादव, 17 गुर्जर-जाट, 14 अनुसूचित जाति (SC), 3 अनुसूचित जनजाति (ST), 2 सिख और 50 अन्य जातियों व समुदायों के लोग शामिल हैं। यदि मोटे तौर पर देखा जाए तो कुल मिलाकर 138 हिंदू और 67 मुस्लिम अपराधी पुलिस की गोलियों का शिकार हुए हैं। यह आंकड़े साफ करते हैं कि पुलिस की रडार पर हर वो शख्स रहा है जिसने कानून को अपने हाथ में लेने की जुर्रत की है।
मेरठ और आगरा बने सबसे बड़े ‘एनकाउंटर हब’
अगर उत्तर प्रदेश के विभिन्न पुलिस जोनों की बात करें, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ जोन अपराधियों के सफाए में सबसे आगे रहा है। मार्च 2017 से लेकर मई 2026 तक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अकेले मेरठ जोन में कुल 4,813 पुलिस मुठभेड़ें हुईं, जिनमें 97 दुर्दांत अपराधी मारे गए और 3,513 घायल हुए। इस दौरान पुलिस ने करीब 8,921 अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजा। इसके बाद आगरा जोन का नंबर आता है, जहां 2,494 एनकाउंटर में 24 अपराधी ढेर हुए। वहीं, पूर्वांचल के वाराणसी जोन में भी पुलिस ने कड़ा रुख अपनाते हुए 1,292 मुठभेड़ों को अंजाम दिया, जिसमें 29 अपराधी मारे गए। विकास दुबे, अनिल दुजाना, टिंकू कपाला और अतीक अहमद के बेटे असद जैसे बड़े और खूंखार चेहरों का अंत इसी सख्त पुलिसिंग का नतीजा माना जाता है।
अपराध के ग्राफ में आई भारी गिरावट, NCRB ने लगाई मुहर
सरकार की इस ‘ठोक दो’ और जीरो टॉलरेंस की नीति का असर जमीन पर भी दिखने लगा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े गवाही देते हैं कि साल 2017 के मुकाबले साल 2024 तक उत्तर प्रदेश में गंभीर अपराधों के ग्राफ में भारी कमी दर्ज की गई है। सूबे में जहां 2017 में हत्या के 4,324 मामले दर्ज किए गए थे, वहीं 2024 में यह घटकर 3,215 रह गए। इसी तरह अपहरण के मामलों में लगभग आधी गिरावट आई है, जो 19,921 से घटकर 11,773 पर आ गए हैं। बलात्कार के मामलों में भी बड़ी कमी देखी गई है और डकैती के मामले तो 263 से सिमटकर महज 57 रह गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की साफ चेतावनी है कि यूपी की धरती पर अपराध करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। बुलडोजर एक्शन, गैंगस्टर एक्ट और सख्त पुलिसिंग के दम पर सरकार सूबे में ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का नया कीर्तिमान स्थापित करने का दावा कर रही है।
