अयोध्या में राम मंदिर के ध्वजारोहण समारोह को लेकर पाकिस्तान ने मंगलवार को बयान दिया था। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कार्यक्रम में शामिल होने की आलोचना की। पाकिस्तान का आरोप था कि भारत में धार्मिक आधार पर राजनीति की जा रही है और इससे अल्पसंख्यकों को गलत संदेश जाता है। राम मंदिर में ध्वजारोहण का यह आयोजन मंदिर के निर्माण के औपचारिक समापन का प्रतीक था, जिसमें देशभर से श्रद्धालुओं और गणमान्य लोगों की मौजूदगी रही। पाकिस्तान की इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक माहौल अचानक गर्म हो गया और दोनों देशों के बीच एक बार फिर शब्दों की जंग छिड़ गई।
भारत ने दिया सख्त संदेश—‘हमसे उपदेश न लें’
भारत ने पाकिस्तान की इस टिप्पणी को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि पाकिस्तान अपने यहां बिगड़ते हालात और आतंकी गतिविधियों को नियंत्रित करे, भारत को किसी भी तरह का ज्ञान देने की कोशिश न करे। भारत ने यह भी कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक समारोहों में भाग लेना भारत के लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है, और इसमें बाहरी देशों को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। भारत की यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान के बयान को सीधे तौर पर फटकार समझी जा रही है।
ध्वजारोहण से पूरा हुआ दशकों का इंतजार
राम मंदिर में आयोजित ध्वजारोहण समारोह न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना गया। मंदिर के निर्माण का यह अंतिम चरण पिछले कई दशकों से चल रहे कानूनी और सामाजिक संघर्ष के अंत का प्रतीक है। प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति को श्रद्धालुओं ने भारतीय संस्कृति के उत्सव के रूप में देखा। समारोह में देशभर में धार्मिक और सांस्कृतिक उत्साह देखने को मिला, वहीं पाकिस्तान की आलोचना को लोग भारत के आंतरिक मामलों में दखल के रूप में देख रहे हैं।
बयानबाजी से बढ़ा तनाव
इस विवाद के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक बार फिर तल्खी देखने को मिली। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अक्सर भारत के धार्मिक या राजनीतिक कार्यक्रमों पर टिप्पणी करता है, जबकि उसे अपने आंतरिक हालात पर ध्यान देना चाहिए। भारत ने अपने बयान में यह स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक आयोजनों को लेकर किसी भी बाहरी देश से सवाल स्वीकार नहीं करेगा। कूटनीतिक रूप से देखा जाए तो भारत का यह रुख अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी एक मजबूत संदेश देता है कि वह अपने आंतरिक मामलों में किसी भी अप्रासंगिक टिप्पणी को बर्दाश्त नहीं करेगा।
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