धर्म और निजी जिंदगी की स्वतंत्रता पर बहस तब तेज हो गई जब ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने एक हाई-प्रोफाइल अंतरधार्मिक विवाह को लेकर फतवा जारी कर दिया। उनका तर्क था कि इस्लामी शरीयत के मुताबिक एक मुस्लिम पुरुष और गैर-मुस्लिम महिला का निकाह तब तक वैध नहीं माना जाता, जब तक कि निकाह से पहले महिला इस्लाम धर्म स्वीकार न कर ले। इस फतवे के सामने आने के बाद से ही देश भर में धार्मिक और कानूनी मान्यताओं को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है, क्योंकि इस तरह के मामले अक्सर समाज में आस्था और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच एक लंबी खींचतान खड़े कर देते हैं।
कुरान की आयतों में अंतरधार्मिक विवाह को लेकर क्या है प्रावधान?
इस्लामी कानून और कुरान की व्याख्याओं के अनुसार, अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच निकाह को लेकर बेहद स्पष्ट और सख्त निर्देश दिए गए हैं। कुरान की सूरह अल-बकरा की आयत 221 और सूरह अल-मुम्तहिना की आयत 10 में आम तौर पर बहुदेववादियों या गैर-मुस्लिमों के साथ विवाह करने से मना किया गया है। वहीं, सूरह अल-मायदा की आयत 5 के तहत मुस्लिम पुरुषों को ‘अहल-ए-किताब’ यानी यहूदी और ईसाई महिलाओं से निकाह करने की विशेष अनुमति जरूर दी गई है, लेकिन पारंपरिक इस्लामी फिकह में हिंदू धर्म को इस दायरे में नहीं रखा गया है। इसी आधार पर इस्लामी विद्वान यह मानते हैं कि बिना धर्म परिवर्तन के ऐसा विवाह शरीयत की नजर में जायज नहीं ठहरता।
भारतीय कानून और स्पेशल मैरिज एक्ट क्या देता है अधिकार?
धार्मिक नियमों और फतवों से इतर, भारतीय संविधान देश के हर बालिग नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार देता है। यदि दो अलग-अलग धर्मों के लोग बिना अपना धर्म बदले शादी करना चाहते हैं, तो इसके लिए देश में ‘स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954′ (Special Marriage Act) मौजूद है। इस कानून की धारा 4 के तहत तय उम्र और कानूनी शर्तों को पूरा करने वाले वयस्क जोड़े मैरिज ऑफिसर के समक्ष आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने भी कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे शफीन बनाम अशोकन मामला) में यह साफ किया है कि वयस्क नागरिकों को अपना साथी चुनने की पूरी आजादी है और कोई भी धार्मिक आदेश इस कानूनी अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकता।
क्या मौलाना का फतवा भारतीय अदालतों में शादी को कर सकता है अमान्य?
धार्मिक दृष्टिकोण और देश के संविधान के बीच का सबसे बड़ा फर्क यही है कि किसी भी मौलाना या मुफ्ती द्वारा जारी किया गया फतवा केवल एक धार्मिक राय या व्याख्या होती है, न कि देश की किसी अदालत का कानूनी आदेश। शरीयत के लिहाज से भले ही कोई निकाह नाजायज करार दिया जाए, लेकिन यदि कोई जोड़ा स्पेशल मैरिज एक्ट या अन्य वैध कानूनी प्रावधानों के तहत शादी करता है, तो वह भारतीय कानून की नजर में पूरी तरह से वैध और सुरक्षित है। इसलिए, व्यक्तिगत पसंद, धार्मिक मान्यताएं और संवैधानिक अधिकार अपने-अपने दायरे में काम करते हैं, और फतवे जैसे बयान किसी कानूनी विवाह की वैधता को खत्म करने की क्षमता नहीं रखते।
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