अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के बाद दोनों देशों के रिश्तों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। इस बीच ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई ने ऐसा बयान दिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। उन्होंने कहा कि इस समझौते की सबसे ज्यादा जरूरत अमेरिका को थी, जबकि ईरान ने अपने राष्ट्रीय हितों और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। खामेनेई के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति इस समझौते को अंतिम रूप देने के लिए लगातार प्रयास करते रहे और कई स्तरों पर दबाव भी बनाया गया। उन्होंने कहा कि ईरान ने केवल अपने अधिकारों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ने का फैसला लिया।
‘मेरी सोच अलग थी, लेकिन देशहित को दी प्राथमिकता’
मुज्तबा खामेनेई ने स्वीकार किया कि इस समझौते को लेकर उनकी व्यक्तिगत राय अलग थी। उनका कहना था कि वह शुरुआत में इस दिशा में आगे बढ़ने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति को इस शर्त पर अनुमति दी कि किसी भी स्थिति में देश के हितों और प्रतिरोध मोर्चे के अधिकारों से समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने साफ कहा कि यदि भविष्य में अमेरिका तय दायरे से बाहर जाकर अतिरिक्त शर्तें थोपने की कोशिश करेगा तो ईरान उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। साथ ही उन्होंने देशवासियों से धैर्य बनाए रखने और समझौते के परिणामों का इंतजार करने की अपील भी की।
समझौते में क्या-क्या तय हुआ, जानिए अहम बातें
दोनों देशों के बीच हुए इस समझौता ज्ञापन में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बनी है। इसके तहत लेबनान समेत विभिन्न मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को रोकने की दिशा में कदम उठाने की बात कही गई है। अमेरिका ने 30 दिनों के भीतर ईरान पर लगाए गए नौसैनिक प्रतिबंध हटाने की सहमति जताई है, जबकि समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही को सामान्य स्तर पर लाने की योजना भी शामिल है। समझौते के अनुसार व्यापक सहमति बनने के 30 दिनों के भीतर अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी कम करेगा। वहीं ईरान ने अगले 60 दिनों तक व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षित और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने का भरोसा दिया है। इन प्रावधानों को पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
अब 60 दिनों पर टिकी दुनिया की नजर
समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने के बाद अब दोनों देशों के पास अंतिम और व्यापक समझौते तक पहुंचने के लिए 60 दिनों का समय होगा। इस दौरान कई दौर की बातचीत प्रस्तावित है और जिनेवा में होने वाली बैठक भी तय कार्यक्रम के अनुसार आयोजित की जाएगी। यदि दोनों पक्ष अंतिम समझौते पर सहमत हो जाते हैं तो यह पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि आगे की बातचीत आसान नहीं होगी, क्योंकि कई रणनीतिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अभी भी मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में आने वाले दो महीने यह तय करेंगे कि यह समझौता स्थायी शांति की शुरुआत बनता है या फिर कूटनीतिक प्रयासों का एक और अधूरा अध्याय साबित होता है।
