उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। इसी बीच योगी सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने ग्रामीण राजनीति का पूरा समीकरण बदलने के संकेत दे दिए हैं। राज्य सरकार ने ‘राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ के गठन को मंजूरी दे दी है। यह आयोग पंचायतों में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC आरक्षण तय करने का काम करेगा। सरकार का कहना है कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार उठाया गया है, ताकि पंचायत चुनावों में आरक्षण को लेकर किसी तरह का कानूनी विवाद न हो। लंबे समय से पंचायत चुनाव में देरी और आरक्षण व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के बीच इस फैसले को बेहद अहम माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आयोग की रिपोर्ट आने के बाद पंचायत चुनावों का पूरा गणित बदल सकता है।
अब पंचायतवार सर्वे से तय होगा आरक्षण
सरकार द्वारा गठित यह आयोग प्रदेश की ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत स्तर पर विस्तृत अध्ययन करेगा। आयोग यह पता लगाएगा कि किस पंचायत क्षेत्र में पिछड़े वर्ग की कितनी आबादी है और उनकी सामाजिक व प्रशासनिक स्थिति क्या है। इसके आधार पर आरक्षण का अनुपात तय किया जाएगा। यानी अब केवल अनुमान या पुराने आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि पंचायतवार वास्तविक स्थिति देखकर OBC आरक्षण लागू किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इससे आरक्षण व्यवस्था ज्यादा पारदर्शी और न्यायसंगत बनेगी। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय होगा कि किन पंचायत सीटों को OBC वर्ग के लिए आरक्षित किया जाएगा। खास बात यह है कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय ‘ट्रिपल टेस्ट’ नियम के तहत पूरी की जाएगी, ताकि भविष्य में अदालत में किसी तरह की चुनौती का सामना न करना पड़े।
27 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगा OBC आरक्षण
प्रदेश सरकार ने साफ किया है कि पंचायत चुनावों में पिछड़े वर्गों को दिया जाने वाला आरक्षण कुल सीटों और पदों के 27 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। संविधान के अनुच्छेद 243D और उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम के तहत राज्य सरकार को SC, ST और OBC वर्गों को आरक्षण देने का अधिकार प्राप्त है। फिलहाल ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य और अध्यक्ष पदों पर आरक्षण लागू करने के लिए 1994 की नियमावली लागू है। अब आयोग के गठन के बाद इन नियमों के तहत नई रिपोर्ट तैयार की जाएगी। माना जा रहा है कि कई जिलों में पंचायत सीटों का आरक्षण बदल सकता है, जिससे स्थानीय नेताओं की राजनीतिक रणनीति भी प्रभावित होगी। पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवार अब आयोग की रिपोर्ट पर नजर बनाए हुए हैं। ग्रामीण इलाकों में भी इस फैसले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
क्या पंचायत चुनाव में हो सकती है देरी?
सरकार के इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या पंचायत चुनाव तय समय पर होंगे या फिर आयोग की रिपोर्ट आने तक चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक चुनाव टालने को लेकर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन माना जा रहा है कि आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही आरक्षण की अंतिम सूची जारी होगी। ऐसे में चुनाव कार्यक्रम में कुछ बदलाव संभव माने जा रहे हैं। दूसरी ओर विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल भी उठा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार चुनाव से पहले राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रही है, जबकि सरकार इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। अब सबकी नजर आयोग की रिपोर्ट और राज्य निर्वाचन आयोग के अगले फैसले पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में पंचायत चुनाव और आरक्षण को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति और ज्यादा गर्म होने की संभावना है।
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