UP Panchayat Election: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर बड़ी राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है। अब संकेत मिल रहे हैं कि ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कराना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। इसकी सबसे बड़ी वजह ओबीसी आरक्षण को लेकर गठित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट मानी जा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने पंचायत चुनावों में पिछड़ा वर्ग आरक्षण तय करने के लिए विशेष आयोग का गठन किया है और उसे छह महीने का समय दिया गया है। माना जा रहा है कि आयोग अपनी रिपोर्ट नवंबर 2026 से पहले सरकार को नहीं सौंप पाएगा। ऐसे में मार्च 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पंचायत चुनाव कराना राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से मुश्किल माना जा रहा है। इसी कारण अब संभावना जताई जा रही है कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद कराए जा सकते हैं।
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल खत्म, अब कौन संभालेगा जिम्मेदारी?
उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों का मौजूदा कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि चुनाव नहीं होने की स्थिति में पंचायतों का कामकाज कैसे चलेगा। सूत्रों के मुताबिक सरकार प्रशासकों या प्रशासनिक समितियों को जिम्मेदारी सौंप सकती है। इन समितियों में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जा सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से दो-तीन महीने पहले पंचायत चुनाव कराना किसी भी राजनीतिक दल के लिए जोखिम भरा हो सकता है। पंचायत चुनावों में अक्सर स्थानीय स्तर पर गुटबाजी, नाराजगी और बगावत देखने को मिलती है। कई बार पार्टी समर्थित उम्मीदवार आमने-सामने आ जाते हैं, जिससे विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि सरकार पंचायत चुनावों को फिलहाल टालने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर सकती है।
आरक्षण तय करने के लिए क्यों जरूरी है आयोग की रिपोर्ट?
उत्तर प्रदेश सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है। यह आयोग पंचायतों में सामाजिक और राजनीतिक पिछड़ेपन का अध्ययन करेगा और उसी आधार पर आरक्षण की सिफारिश करेगा। आयोग में पांच सदस्य शामिल किए गए हैं, जिसमें हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज को अध्यक्ष बनाया गया है। यह पूरा काम उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम 1961 और पंचायत राज अधिनियम 1947 के तहत किया जा रहा है। वर्तमान नियमों के मुताबिक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा ओबीसी वर्ग को पंचायत चुनावों में 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है। हालांकि नई जनसंख्या के आंकड़े उपलब्ध न होने की स्थिति में आयोग सर्वेक्षण के जरिए नया डेटा जुटाएगा। इसके बाद ही पंचायत चुनावों में सीटों का आरक्षण तय किया जाएगा। यही प्रक्रिया चुनाव कार्यक्रम में देरी की बड़ी वजह बनती दिखाई दे रही है।
2021 पंचायत चुनाव में बीजेपी का रहा था दबदबा
पिछले पंचायत चुनावों के नतीजे भी इस बार की राजनीतिक रणनीति को प्रभावित कर रहे हैं। वर्ष 2021 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जिला पंचायत अध्यक्ष की 75 सीटों में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इनमें 21 सीटों पर भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए थे। वहीं समाजवादी पार्टी को एटा, आजमगढ़, संत कबीर नगर, बलिया और इटावा जैसी सीटों पर जीत मिली थी। बागपत में राष्ट्रीय लोकदल और निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। पंचायत चुनावों को हमेशा विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जाता है, इसलिए सभी राजनीतिक दल इस बार बेहद सतर्क नजर आ रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आयोग अपनी रिपोर्ट कब सौंपता है और सरकार पंचायत चुनाव की नई तारीखों को लेकर क्या फैसला लेती है।
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