महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। बीजेपी नेता और राज्य मंत्री नितेश राणे (Nitesh Rane) को साल 2019 के चर्चित ‘कीचड़ कांड’ में कोर्ट ने दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। सिंधुदुर्ग की एक अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों को कानून का पालन करना चाहिए, न कि उसे अपने हाथ में लेना चाहिए। कोर्ट ने राणे को एक महीने की सजा और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा दी है। हालांकि इस फैसले के तुरंत बाद मामले में नया मोड़ आ गया, जिससे यह सवाल उठने लगा कि क्या उन्हें वास्तव में जेल जाना पड़ेगा या नहीं।
क्या था पूरा ‘कीचड़ कांड’?
यह मामला साल 2019 का है, जब नितेश राणे (Nitesh Rane) उस समय कांग्रेस पार्टी में थे। आरोप है कि उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के सब-डिवीजनल इंजीनियर प्रकाश शेडेकर को मुंबई-गोवा हाईवे के निर्माण कार्य को लेकर कंकावली के पास एक पुल पर बुलाया था। वहां राणे और उनके समर्थकों ने इंजीनियर पर कीचड़ भरा पानी फेंका और उन्हें उसी कीचड़ में चलने के लिए मजबूर किया। इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामला काफी चर्चा में रहा और उनके खिलाफ दंगा, सरकारी काम में बाधा डालने और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोपों में केस दर्ज किया गया।
कोर्ट ने किन धाराओं में माना दोषी?
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस वीएस देशमुख ने पाया कि राणे का व्यवहार सार्वजनिक शांति भंग करने वाला था। अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 504 के तहत दोषी ठहराया, जो जानबूझकर अपमान करने से जुड़ी है। इसके तहत Nitesh Rane को एक महीने की सजा और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस जुर्माने में से 50 हजार रुपये पीड़ित इंजीनियर को मुआवजे के तौर पर दिए जाने का आदेश भी दिया गया है। हालांकि, इसी केस में शामिल अन्य 29 आरोपियों को पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण बरी कर दिया गया, जिससे मामला और दिलचस्प हो गया है।
सजा पर रोक क्यों और आगे क्या होगा?
फैसला सुनाए जाने के बाद Nitesh Rane की ओर से अदालत में सजा पर रोक लगाने की अपील की गई, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। अदालत ने उन्हें उच्च न्यायालय में अपील करने के लिए समय दे दिया है, जिसके चलते फिलहाल उनकी सजा पर रोक लग गई है। इसका मतलब यह है कि अभी उन्हें जेल नहीं जाना होगा। अब इस मामले की अगली सुनवाई हाई कोर्ट में होगी, जहां यह तय होगा कि सजा बरकरार रहती है या उसमें कोई बदलाव किया जाता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी है कि कानून के सामने सभी समान हैं या नहीं।
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