Homeराजनीतिमहिला आरक्षण बिल के लिए सरकार को चाहिए थे कितने वोट? 298...

महिला आरक्षण बिल के लिए सरकार को चाहिए थे कितने वोट? 298 वोट मिलने के बाद भी क्यों गिरा बिल, विपक्ष ने पलटी बाजी

लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पारित नहीं हो सका क्योंकि दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। जानिए विपक्ष और सरकार के बीच क्यों उलझा यह ऐतिहासिक विधेयक और क्या है पूरा राजनीतिक विवाद।

-

संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल यानी ‘131वां संविधान संशोधन विधेयक’ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में रहा। सरकार ने इस बिल को ऐतिहासिक कदम बताते हुए पेश किया, लेकिन लोकसभा में यह उम्मीद के मुताबिक समर्थन हासिल नहीं कर सका। मतदान के दौरान कुल 528 वोट पड़े, जिनमें से 298 वोट पक्ष में और 230 वोट विपक्ष में गए। हालांकि बिल को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोट नहीं मिल पाए। इसी कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका और संसद में ही अटक गया। इस पूरे घटनाक्रम ने देश की आधी आबादी के लिए बड़ी उम्मीदों को झटका दिया और राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया।

सरकार बनाम विपक्ष, बहस में उलझा महिला आरक्षण का मुद्दा

लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से अपील की कि वे महिला सशक्तिकरण के इस कदम का समर्थन करें, लेकिन विपक्ष ने इसे लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि परिसीमन और जनसंख्या संतुलन को ध्यान में रखते हुए यह विधेयक जरूरी है, क्योंकि देश के कई संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या असंतुलित हो चुकी है। उन्होंने तर्क दिया कि सांसदों के लिए सभी मतदाताओं तक पहुंच बनाना लगातार कठिन होता जा रहा है। दूसरी ओर विपक्ष का कहना था कि इस बिल में कई व्यावहारिक और राजनीतिक खामियां हैं, जिन पर गंभीर चर्चा जरूरी है।

विपक्ष का हमला—‘यह महिला आरक्षण नहीं, राजनीतिक रणनीति है’

विपक्षी दलों ने इस विधेयक को लेकर सरकार पर तीखे आरोप लगाए। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे “छलावा” बताते हुए कहा कि इस बिल का असली उद्देश्य महिलाओं को तुरंत अधिकार देना नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों को बदलना है। उन्होंने दावा किया कि परिसीमन और जनगणना की शर्तों के जरिए इसे लंबे समय तक टालने की कोशिश की जा रही है। उनका यह भी कहना था कि इससे देश का चुनावी नक्शा प्रभावित हो सकता है, जिससे कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व कम या ज्यादा हो सकता है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने भी कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण बिल के खिलाफ नहीं है, लेकिन मौजूदा प्रक्रिया में पारदर्शिता और समानता की कमी है। उनके अनुसार ओबीसी वर्ग को शामिल न करना और पुराने आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेना न्यायसंगत नहीं है।

परिसीमन, जनगणना और भविष्य की राजनीति का नया मोड़

इस पूरे विवाद के केंद्र में परिसीमन और जनगणना की शर्तें सबसे बड़ी वजह बनकर उभरी हैं। सरकार का तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्गठन जरूरी है ताकि प्रतिनिधित्व संतुलित हो सके, जबकि विपक्ष को डर है कि इससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक असंतुलन बढ़ सकता है। कई क्षेत्रीय दलों ने भी इस पर चिंता जताई है कि उनकी सीटें घट सकती हैं। यही वजह है कि महिला आरक्षण बिल अब सिर्फ एक सामाजिक सुधार का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह देश की राजनीतिक संरचना को बदलने वाला बड़ा विषय बन गया है। फिलहाल बिल पारित नहीं हो सका है, लेकिन इस पर बहस आने वाले समय में और तेज होने की पूरी संभावना है।

Read More-संसद में ‘धड़ाम’ हुआ बिल, केजरीवाल का बड़ा ऐलान—“मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू!”

 

Related articles

Leave a reply

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest posts