दिल्ली में छात्रों के आंदोलन, CJP के संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई और जंतर-मंतर से प्रदर्शनकारियों को हटाने के मामले ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट में इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया और चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस के जवाब के बाद याचिकाकर्ता अपना प्रत्युत्तर दाखिल करेंगे। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को निर्धारित की गई है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि घटनास्थल से जुड़े सभी सीसीटीवी और बॉडी कैमरा फुटेज सुरक्षित रखे जाएं ताकि भविष्य में जांच के दौरान किसी भी महत्वपूर्ण साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ न हो।
याचिकाकर्ताओं ने लगाए गंभीर आरोप
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने अदालत को बताया कि CJP प्रदर्शन कई दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था और प्रदर्शनकारियों को किसी प्रकार की पूर्व चेतावनी दिए बिना बल प्रयोग किया गया। उन्होंने अदालत के सामने दावा किया कि कार्रवाई के दौरान कई छात्र-छात्राएं घायल हुए और कुछ छात्राओं के साथ कथित तौर पर छेड़छाड़ भी हुई। उन्होंने मांग की कि यदि वीडियो और अन्य साक्ष्यों में संबंधित अधिकारी पहचान में आते हैं तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई की जाए। याचिका में यह भी कहा गया कि पुलिस की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत निष्पक्षता और वैधानिकता की कसौटी पर जांची जानी चाहिए। साथ ही पूरी घटना की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी उठाई गई।
वकीलों ने कोर्ट में रखे कई अहम तर्क
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि प्रदर्शनकारी करीब 20 दिनों से शांतिपूर्ण ढंग से धरने पर बैठे थे और संसद मार्च की घोषणा पहले से सार्वजनिक थी। उनके अनुसार, इतने लंबे समय तक कोई हिंसक घटना सामने नहीं आई थी, लेकिन मार्च के दिन अचानक हालात बदल गए। उन्होंने दावा किया कि मौके पर डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ और बड़ी संख्या में छात्र मौजूद थे। अदालत में यह भी कहा गया कि कुछ वीडियो में सादे कपड़ों में मौजूद लोग लाठियां लिए दिखाई दे रहे हैं, जिनकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कई छात्रों को गंभीर चोटें आई हैं और घायल लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसलिए पूरे घटनाक्रम की उच्च स्तरीय जांच कर जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
साक्ष्य सुरक्षित रखने पर अदालत का विशेष जोर
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिया कि घटना से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक और भौतिक साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं। इसमें सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा फुटेज, पुलिस के ऑपरेशन से जुड़े रिकॉर्ड, आंसू गैस और बल प्रयोग से संबंधित दस्तावेज भी शामिल हैं। अदालत ने फिलहाल मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह स्पष्ट किया कि सभी पक्षों का पक्ष सुनने के बाद ही आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा। अब पुलिस को निर्धारित समय के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा। इस बीच यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है और अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
