ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग होकर विपक्षी तेवर दिखा रहे पूर्व विधायक हुमायूं कबीर ने अब खुलकर अपनी नई सियासी पहचान का ऐलान कर दिया है। कबीर का कहना है कि उन्होंने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से बात की है और ओवैसी ने उन्हें “बंगाल का ओवैसी” बताया है। यह बयान बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ता दिख रहा है।
कबीर के इस दावे को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि वे सीधे उन वोटों पर नज़र गड़ाए बैठे हैं, जिन पर अब तक TMC का मजबूत कब्जा माना जाता रहा है। उनके इस बयान के बाद यह साफ हो गया है कि वह खुद को एक नए मुस्लिम चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
2026 चुनाव में ‘किंगमेकर’ बनने का दावा
हुमायूं कबीर पहले भी कह चुके हैं कि 2026 के विधानसभा चुनाव में वे निर्णायक भूमिका निभाएंगे। उनका कहना है कि वे न सिर्फ चुनाव लड़ेंगे, बल्कि राज्य की सरकार बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं।
कबीर का दावा है कि आने वाले महीनों में उनका जनाधार और बढ़ेगा और वे बंगाल की राजनीति में एक मजबूत विकल्प बनकर उभरेंगे। बरसों तक TMC से जुड़े रहने के बाद अचानक बदले तेवरों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंकाया है। वे मानते हैं कि कबीर का यह कदम मुस्लिम वोटों में बिखराव पैदा कर सकता है, जिसका सीधा असर TMC के गणित पर पड़ेगा।
नई पार्टी का ऐलान: 22 दिसंबर को ‘नई शुरुआत’
हुमायूं कबीर ने अपने कार्यक्रमों की तारीख भी सार्वजनिक कर दी है। उन्होंने कहा है कि 10 दिसंबर को वे कोलकाता में बैठक कर अपनी पार्टी की कमेटी बनाएंगे। इसके बाद 22 दिसंबर को लाखों समर्थकों की मौजूदगी में अपनी नई पार्टी की औपचारिक घोषणा करेंगे।
इस आयोजन को बड़ा राजनीतिक कार्यक्रम माना जा रहा है। कबीर का दावा है कि उनके समर्थन में बड़ी संख्या में युवा और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग जुड़े हैं, जो नए नेतृत्व की तलाश में थे। उनकी नई पार्टी का नाम क्या होगा, इसका खुलासा 22 दिसंबर को किया जाएगा, लेकिन उनकी तैयारियों ने बंगाल की राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।
TMC के लिए बढ़ी मुश्किलें; विपक्ष की निगाहें टिकीं
कबीर के इस कदम को TMC के लिए एक नई चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। खासकर उस समय जब ममता बनर्जी पहले ही विपक्षी दलों और केंद्र सरकार से टक्कर ले रही हैं, ऐसे में मुस्लिम वोट बैंक में सेंध का खतरा पार्टी की चिंता बढ़ा रहा है।
वहीं, बीजेपी और लेफ्ट जैसी पार्टियां भी इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कबीर सच में प्रभावी साबित होते हैं, तो आने वाले चुनाव में वोटों का गणित दिलचस्प मोड़ ले सकता है।
फिलहाल, बंगाल की राजनीति में उनकी एंट्री ने चर्चा का नया दौर शुरू कर दिया है और आने वाले हफ्ते तस्वीर को और स्पष्ट करेंगे।
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