देश में चीनी की कीमतों में तेजी ने आम लोगों से लेकर मिठाई और खाद्य कारोबारियों तक की परेशानी बढ़ा दी है। अगस्त 2026 में कई शहरों में चीनी का खुदरा भाव करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। वहीं औसत खुदरा कीमत भी पिछले साल के मुकाबले बढ़ी है। थोक बाजार में भी चीनी के भाव लंबे समय के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं। इसके पीछे कम उत्पादन, घटता स्टॉक, त्योहारी सीजन में बढ़ती मांग और गन्ने के एक हिस्से का इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल जैसे कई कारण बताए जा रहे हैं। यानी बाजार में चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है और इसका असर सीधे कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
E20 नीति और कमजोर मानसून से बढ़ी परेशानी
चीनी की कीमत बढ़ने की एक बड़ी वजह पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति भी मानी जा रही है। इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का इस्तेमाल बढ़ने से चीनी बनाने के लिए उपलब्ध गन्ने पर असर पड़ा है। इसके अलावा इस साल मानसून की स्थिति भी कई इलाकों में चिंता का कारण बनी है। कम बारिश से गन्ने की फसल प्रभावित होने की आशंका है। दूसरी ओर 2026-27 सीजन की शुरुआत में चीनी का शुरुआती स्टॉक भी पिछले सीजन की तुलना में कम रहने का अनुमान है। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
सरकार ने उठाए कदम, लेकिन तुरंत सस्ती नहीं होगी चीनी
बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह आयात 31 अक्टूबर तक किया जा सकेगा। इसके अलावा बड़े उपभोक्ताओं के लिए चीनी का स्टॉक रखने की सीमा भी सख्त की गई है। सरकार पहले ही सितंबर के अंत तक चीनी निर्यात पर रोक लगा चुकी है। इन कदमों का उद्देश्य बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराना और जमाखोरी या सट्टेबाजी पर नियंत्रण रखना है। हालांकि, आयातित चीनी को बाजार तक पहुंचने में समय लग सकता है। इसलिए आने वाले दिनों में कीमतों में कुछ राहत संभव है, लेकिन तुरंत बड़ी गिरावट की उम्मीद कम है।
चीनी महंगी, फिर भी किसान के खाते में पैसा नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब चीनी के दाम बढ़ रहे हैं तो इसका फायदा गन्ना किसानों को क्यों नहीं मिल रहा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी 2026 तक देशभर में गन्ना किसानों का 16,087 करोड़ रुपये से ज्यादा भुगतान बकाया था। कई राज्यों में किसानों को मिलों से अपना पैसा मिलने का इंतजार है। चीनी के महंगे होने से मिलों का कारोबार और नकदी प्रवाह बेहतर हो सकता है, लेकिन इसका फायदा किसानों तक समय पर नहीं पहुंच रहा। आने वाले समय में सरकार इथेनॉल के लिए गन्ने के डायवर्जन को कम करने पर भी विचार कर रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, आयात और सरकारी नियंत्रण से कीमतों में कुछ नरमी आ सकती है, लेकिन पुरानी 45-46 रुपये प्रति किलो वाली कीमतें तुरंत लौटना मुश्किल है। किसानों को वास्तविक राहत तभी मिलेगी, जब गन्ने का भुगतान समय पर हो और चीनी उद्योग की वित्तीय व्यवस्था में सुधार किया जाए।
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