राजस्थान के सिरोही जिले के जावाल कस्बे में इन दिनों एक अनोखी और कठोर तपस्या लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। यहां स्थित एक आश्रम में श्रीश्री 1008 रामगिरि महाराज ने 41 दिनों की अग्नि तपस्या शुरू की है, जो 15 अप्रैल से आरंभ होकर लगातार जारी है। खास बात यह है कि यह तपस्या ऐसे समय में की जा रही है जब तापमान करीब 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। भीषण गर्मी के बावजूद महाराज रोजाना अग्नि के बीच बैठकर साधना कर रहे हैं, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंच रहे हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गहरी आस्था और विश्वास का प्रतीक बन गया है।
11 अग्नि कुंडों के बीच बैठकर करते हैं कठोर तप
इस तपस्या की सबसे विशेष बात यह है कि रामगिरि महाराज रोज दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक 11 अग्नि कुंडों के बीच बैठते हैं। चारों ओर जलती आग के बीच वे अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर ध्यान में लीन रहते हैं। यह साधना हठ योग की अत्यंत कठिन प्रक्रियाओं में गिनी जाती है, जिसे लंबे समय तक करना आसान नहीं होता। इस दौरान वे पूरी तरह मौन रहते हैं और बाहरी दुनिया से अलग होकर साधना में डूबे रहते हैं। आश्रम के लोगों का कहना है कि यह तपस्या केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति की भी परीक्षा है।
गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने का संकल्प
रामगिरि महाराज की इस तपस्या का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है। उन्होंने इस तपस्या के माध्यम से गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने का संकल्प लिया है। इसके साथ ही वे पशु संरक्षण, विश्व कल्याण और समाज में बढ़ रहे नारी अत्याचार के खिलाफ जागरूकता फैलाने का संदेश भी दे रहे हैं। उनके अनुयायियों का मानना है कि इस तरह की साधना से समाज में सकारात्मक बदलाव आ सकता है और लोगों के भीतर नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ती है। महाराज का यह संकल्प धार्मिक भावना के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों को भी जोड़ता है, जिससे यह तपस्या और भी महत्वपूर्ण बन जाती है।
दर्शन के लिए उमड़ रही भीड़
इस अनोखी तपस्या को देखने और महाराज के दर्शन करने के लिए रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु आश्रम पहुंच रहे हैं। आसपास के गांवों और शहरों से लोग यहां आकर उनकी साधना का साक्षी बन रहे हैं। आश्रम परिसर में लगातार भक्तों की भीड़ बनी रहती है, जिससे पूरे क्षेत्र में धार्मिक और आध्यात्मिक माहौल देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह के आयोजन से समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और लोगों के मन में आस्था मजबूत होती है। यह तपस्या अगले 41 दिनों तक जारी रहेगी, जिसे लेकर क्षेत्र में उत्सुकता और श्रद्धा दोनों चरम पर हैं।
