रामलिंगा रेड्डी के इस्तीफे की घोषणा ने कर्नाटक की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। राज्य मंत्रिमंडल में विभागों के बंटवारे के बाद कांग्रेस सरकार के भीतर असंतोष की खबरें सामने आ रही थीं, लेकिन अब यह नाराजगी खुलकर दिखाई देने लगी है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और आठ बार विधायक रह चुके रामलिंगा रेड्डी ने मंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें जिस विभाग की उम्मीद थी, वह नहीं मिला, जिससे वे निराश हुए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि उनका फैसला पार्टी के खिलाफ नहीं है और वे कांग्रेस के साथ जुड़े रहेंगे। उनके इस कदम को राज्य की सियासत में एक बड़े घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में रखी अपनी बात
इस्तीफे की घोषणा करते हुए रामलिंगा रेड्डी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनका किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत मतभेद नहीं है, लेकिन आत्मसम्मान उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि विभागों के बंटवारे के बाद उन्हें महसूस हुआ कि उनके साथ किए गए वादे पूरे नहीं किए गए। इसी कारण उन्होंने मंत्री पद छोड़ने का निर्णय लिया। रेड्डी ने यह भी जानकारी दी कि उन्होंने अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा दिया है। उन्होंने कहा कि वे विधायक के रूप में जनता की सेवा जारी रखेंगे और पार्टी संगठन में भी सक्रिय बने रहेंगे। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
विभाग को लेकर किया बड़ा दावा
रामलिंगा रेड्डी का कहना है कि उन्हें पहले से बेंगलुरु शहरी विकास विभाग दिए जाने का आश्वासन मिला था। उनके अनुसार, जब राज्य में नेतृत्व परिवर्तन हुआ था, तब उन्होंने मंत्री पद की इच्छा भी नहीं जताई थी। बाद में उन्हें भरोसा दिलाया गया कि भविष्य में उन्हें यह महत्वपूर्ण विभाग सौंपा जाएगा। रेड्डी ने दावा किया कि इसी भरोसे के आधार पर उन्होंने पार्टी नेतृत्व का समर्थन किया था। लेकिन हालिया विभाग आवंटन में उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं मिली, जिससे वे आहत महसूस कर रहे हैं। उनके इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है और विपक्ष भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठाने लगा है।
कांग्रेस के सामने बढ़ी चुनौती
रामलिंगा रेड्डी के इस्तीफे की घोषणा ऐसे समय हुई है जब कांग्रेस सरकार राज्य में अपने प्रशासनिक कामकाज को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेतृत्व के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती असंतुष्ट नेताओं को संतुष्ट करना होगी ताकि सरकार के भीतर किसी तरह का बड़ा संकट पैदा न हो। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि नाराजगी का दायरा बढ़ता है तो इसका असर सरकार की छवि पर पड़ सकता है। फिलहाल पार्टी की ओर से इस मामले पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि वरिष्ठ नेता स्थिति को संभालने के प्रयास में जुट सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या रामलिंगा रेड्डी अपने फैसले पर कायम रहते हैं या फिर पार्टी नेतृत्व उन्हें मनाने में सफल होता है।
