लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की नागरिकता से जुड़े मामले में उस समय बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने अचानक खुद को इस केस की सुनवाई से अलग कर लिया। यह फैसला उस समय आया, जब मामले की सुनवाई चल रही थी और दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें रख रहे थे। जज के इस कदम ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है और अब इस पर आगे की सुनवाई किसी दूसरी पीठ द्वारा की जाएगी। अदालत के इस निर्णय के पीछे की वजहें भी अब सामने आने लगी हैं, जिसने न्यायिक प्रक्रिया और कोर्ट की गरिमा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सोशल मीडिया पोस्ट पर कोर्ट की सख्त नाराज़गी
दरअसल, इस मामले में याचिका दाखिल करने वाले विग्नेश शिशिर के सोशल मीडिया पोस्ट विवाद का मुख्य कारण बने। सुनवाई के दौरान अदालत ने इन पोस्ट्स पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट का कहना था कि याचिकाकर्ता द्वारा की गई टिप्पणियां न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने वाली हैं। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के बयान न केवल अनुचित हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश भी करते हैं। जस्टिस विद्यार्थी ने साफ शब्दों में कहा कि अदालत के खिलाफ इस तरह की टिप्पणियों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसी बीच, मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने खुद को सुनवाई से अलग करने का फैसला लिया और केस को दूसरी बेंच को सौंप दिया।
कोर्ट में हुई तीखी बहस और टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत और याचिकाकर्ता के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली। याचिकाकर्ता ने अदालत से मामले को कुछ दिन बाद सुनने की अपील की, लेकिन कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि जब केस सूचीबद्ध हो, तभी दलीलें पेश की जानी चाहिए। बाद में जब याचिकाकर्ता ने अपनी बात रखने की कोशिश की, तो कोर्ट ने उन्हें रोकते हुए कहा कि अब उनकी दलीलें नहीं सुनी जाएंगी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट किए हैं, जिनमें कोर्ट पर पक्षपात के आरोप लगाए गए हैं और लोगों से राय मांगी गई है कि क्या केस इसी पीठ के सामने जारी रहना चाहिए। कोर्ट ने इसे न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ बताया और इसे “कोर्ट पर कीचड़ उछालने” जैसा बताया।
आगे क्या होगा, जांच और सुनवाई पर नजर
सुनवाई के अंत में याचिकाकर्ता ने सफाई देते हुए कहा कि उनके पोस्ट अदालत के खिलाफ नहीं थे, बल्कि उन लोगों के लिए थे जो उन पर दबाव बना रहे थे। हालांकि, अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि इस तरह की बातें अब किसी दूसरी पीठ के सामने रखी जाएं। जस्टिस विद्यार्थी ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता चाहें तो आदेश को चुनौती दे सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब मामला नई बेंच के पास जाएगा, जहां आगे की सुनवाई होगी। साथ ही, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मामले में पेश वकीलों ने भी पूरी तरह से जरूरी कानूनी पक्ष नहीं रखा। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि नई पीठ इस केस को किस दिशा में ले जाती है और क्या इस विवाद का कोई ठोस निष्कर्ष निकल पाता है।
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