अमेरिका की राजनीति में उस समय बड़ा भूचाल आ गया जब सीनेट में ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई रोकने से जुड़ा प्रस्ताव पारित हो गया। यह प्रस्ताव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अधिकारों को सीमित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सीनेट में इस प्रस्ताव के पक्ष में 50 वोट पड़े, जबकि 48 सांसदों ने इसका विरोध किया। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
रिपब्लिकन पार्टी में बगावत, अपने ही सांसदों ने किया विरोध
इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी बात यह रही कि राष्ट्रपति ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने भी इसके पक्ष में मतदान किया। इसके अलावा दो सांसद वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहे। यह घटनाक्रम पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति को दर्शाता है। आमतौर पर ट्रंप की नीतियों को पार्टी में मजबूत समर्थन मिलता रहा है, लेकिन इस बार ईरान नीति को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए। डेमोक्रेट पार्टी के एक सांसद ने प्रस्ताव का विरोध भी किया, जिससे यह वोटिंग और भी दिलचस्प हो गई। इस घटनाक्रम को अमेरिकी राजनीति में एक बड़ी “क्रॉस वोटिंग” के रूप में देखा जा रहा है।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में भी ट्रंप को झटका
सीनेट के बाद यह प्रस्ताव निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में भी पारित हो गया। यहां 215 सांसदों ने प्रस्ताव के समर्थन में वोट किया, जबकि 208 सांसदों ने विरोध किया। इस सदन में भी रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। इससे साफ संकेत मिलता है कि ईरान नीति को लेकर अमेरिकी संसद में एक साझा सहमति बनती नजर आ रही है। इस फैसले को 1973 के युद्ध शक्ति अधिनियम से जोड़ा जा रहा है, जिसके तहत राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई पर संसद का नियंत्रण बढ़ जाता है।
कानूनी विवाद और भविष्य की राजनीति पर बड़ा सवाल
व्हाइट हाउस ने इस प्रस्ताव को संवैधानिक रूप से बाध्यकारी नहीं माना है और कहा है कि इस पर कानूनी सवाल बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे का अंतिम समाधान अदालतों में हो सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिका फिलहाल ईरान के साथ शांति समझौते की दिशा में बातचीत कर रहा है, ऐसे में यह प्रस्ताव राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों स्तर पर दबाव बढ़ा सकता है। ट्रंप प्रशासन के लिए यह घटनाक्रम एक बड़े संकेत की तरह देखा जा रहा है, जिससे भविष्य की विदेश नीति और पार्टी एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं।
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