उत्तर प्रदेश के दो चर्चित आईपीएस अधिकारियों संभल के पुलिस कप्तान केके बिश्नोई और बरेली की एसपी साउथ अंशिका वर्मा की जोधपुर (राजस्थान) में भव्य शादी समारोह की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। समारोह में कई सपा नेताओं के पहुँचने और सेल्फी लेने की फोटो‑रील्स ने अचानक इस शादी को राजनीति के केंद्र में ला दिया। शादी की रौनक, भीड़ और मेहमानों की फोटो‑वीडियो इतनी तेजी से पब्लिक डोमेन में आई कि सपा नेतृत्व को इस बारे में जानकारी मिली और मामला राजनीतिक बहस में बदल गया। यह वह मोड़ था जब सामाजिकता से आगे यह मुद्दा सियासत का हिस्सा बन गया।
सपा नेताओं की मौजूदगी और पार्टी की आलोचना
शादी समारोह में शामिल होने वाले सपा नेताओं की सूची में संभल के जिला अध्यक्ष असगर अली अंसारी, संभल सदर से विधायक नवाब इकबाल महमूद, असमोली से विधायक पिंकी यादव और गुन्नौर से विधायक राम खिलाड़ी सिंह यादव प्रमुख रूप से शामिल थे। इन नेताओं के अलावा भी कुछ अन्य सपा कार्यकर्ता और नेताओं के फोटो‑रील्स सोशल मीडिया पर वायरल हुए। पार्टी सूत्रों का कहना है कि ये तस्वीरें जब सपा मीडिया सेल तक पहुँचीं, तो यह मामला नेतृत्व तक पहुँच गया और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सार्वजनिक तौर पर इस पर नाराज़गी जताई। हालांकि अखिलेश यादव ने खुद हल्के अंदाज में जवाब देकर विवाद को रोकने की कोशिश की, लेकिन पार्टी के आधिकारिक संचार विभाग ने कड़ा रुख अपनाया।
पार्टी ने जारी की कड़ी नसीहत और चेतावनी
सपा मीडिया सेल ने एक औपचारिक बयान जारी किया, जिसमें पार्टी नेताओं की इस शादी में मौजूदगी को लेकर चेतावनी भरे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। बयान में आईपीएस के के बिश्नोई को “विवादित” और “भाजपाई” करार दिया गया। पार्टी ने स्पष्ट किया कि बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए ऐसे अधिकारियों के संपर्क में आने से सावधान रहना चाहिए और सपा के नेताओं को ऐसे कार्यक्रमों से दूरी बनाये रखनी चाहिए। बयान में यह भी कहा गया कि कुछ अधिकारी और भाजपा से जुड़े लोग जब जाति‑धर्म जैसे भावनात्मक मुद्दों की वजह से विवादों में रहे हैं, तो वे अब बदलते समय का फायदा उठाते हुए समाजवादियों के संपर्क में आ सकते हैं। इसलिए पार्टी ने कहा कि ऐसे “समाजविरोधी तत्वों” से दूरी बनाना हमारी जिम्मेदारी है।
बिश्नोई की छवि और सपा की नाराज़गी की वजह
आईपीएस केके बिश्नोई को सपा पहले भी विवादित रहा मानती रही है। संभल जिले में जामा मस्जिद के सर्वे के बाद हुई हिंसा और उसके बाद की पुलिस कार्रवाई के चलते उनका नाम लगातार चर्चा में रहा है। बुलडोज़र ऑपरेशन, नोटिस और गिरफ्तारियों से जुड़े वायरल वीडियो ने उन्हें राजनीतिक बहस के केंद्र में खड़ा किया है। सपा आरोप लगाती रही है कि इन कार्रवाइयों में भाजपा का प्रभाव रहा है। पार्टी के नेतृत्व का मानना है कि ऐसे अधिकारी समाजवादी मूल्यों के अनुकूल नहीं हैं और उनके संपर्क में आने से पार्टी को नुकसान हो सकता है। यही वजह है कि सपा मीडिया सेल के बयान में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखना जरूरी है और पार्टी के पदाधिकारी तथा कार्यकर्ता किसी भी व्यवस्था में फंसकर खुद को मुश्किल में न डालें।
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