राहुल गांधी: महाराष्ट्र की राजनीति में बीते 24 घंटे किसी सियासी भूचाल से कम नहीं रहे। रविवार को आए नगर पंचायत और नगर परिषद चुनाव नतीजों ने सत्ता पक्ष को जहां आत्मविश्वास से भर दिया, वहीं विपक्षी खेमे में चिंता और बेचैनी साफ दिखाई देने लगी। खास तौर पर मुंबई और उसके आसपास के इलाकों को लेकर विपक्ष की रणनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं। महाविकास आघाड़ी (MVA) के भीतर कांग्रेस ने सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए 28 सीटें अपने नाम कीं, जबकि उद्धव ठाकरे गुट महज 9 सीटों पर सिमट गया। यही आंकड़े अब विपक्षी राजनीति की दिशा तय कर रहे हैं। जिन नेताओं के तेवर कुछ दिन पहले तक आक्रामक थे, वे अब सहयोग और समझौते की भाषा बोलने को मजबूर दिख रहे हैं। यही वजह है कि संजय राउत, जो हाल तक यह कहते नहीं थक रहे थे कि “जिसे साथ आना है आए, नहीं तो हम अकेले लड़ेंगे”, अब कांग्रेस को साथ लेने की कोशिश में जुट गए हैं। स्थानीय निकाय नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि मुंबई जैसे बड़े शहरी केंद्र में बिना व्यापक गठबंधन के जीत की राह बेहद मुश्किल है।
राहुल गांधी को फोन: मजबूरी या नई रणनीति?
सूत्रों के मुताबिक, नगर निकाय चुनाव नतीजों के बाद संजय राउत ने कांग्रेस नेतृत्व से संपर्क बढ़ाया और सीधे राहुल गांधी को फोन किया। यह कॉल सिर्फ औपचारिक बातचीत नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे 15 जनवरी को होने वाले अहम नगर निगम चुनावों से पहले की “सर्वाइवल स्ट्रेटेजी” के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक—खासतौर पर मुंबई में उत्तर भारतीय और अल्पसंख्यक मुस्लिम मतदाता—अब भी पार्टी की बड़ी ताकत माना जाता है। उद्धव ठाकरे को भी यह भली-भांति पता है कि केवल मराठी वोटों के सहारे बीजेपी-शिंदे गठबंधन को चुनौती देना आसान नहीं है। ऐसे में कांग्रेस का साथ उनके लिए जरूरी हो गया है। वहीं कांग्रेस भी अपने प्रदर्शन से उत्साहित है और वह किसी भी ऐसे गठबंधन में शामिल होने से पहले शर्तें साफ करना चाहती है। राहुल गांधी से हुई बातचीत को दोनों दलों के बीच जमी बर्फ पिघलने का संकेत माना जा रहा है, लेकिन यह रास्ता अभी पूरी तरह आसान नहीं दिखता।
राज ठाकरे फैक्टर और कांग्रेस की सख्त लाइन
इस पूरे सियासी समीकरण में सबसे बड़ी उलझन राज ठाकरे का नाम है। मनसे प्रमुख राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच नजदीकियों की खबरें पहले ही सियासी गलियारों में चर्चा का विषय रही हैं। संजय राउत भी कई बार इशारों में ठाकरे भाइयों के साथ आने की बात कह चुके हैं। लेकिन यहीं कांग्रेस ने अपनी सख्त लाइन खींच दी थी। कांग्रेस नेतृत्व ने साफ कर दिया था कि वह राज ठाकरे की विचारधारा के साथ किसी भी मंच को साझा नहीं करेगी। इसी वजह से राउत ने कुछ दिन पहले कांग्रेस को दरकिनार करते हुए ठाकरे भाइयों के साथ चुनाव लड़ने की बात कही थी। उनका बयान था—“हमारा फैसला हो चुका है, जिसे आना है आए, नहीं तो ना सही।” लेकिन रविवार के नतीजों ने इस रुख पर पानी फेर दिया। अब साफ हो गया है कि कांग्रेस के वोटों के बिना विपक्ष का गणित कमजोर पड़ जाता है। ऐसे में राउत का बदला हुआ सुर इस बात का संकेत है कि राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होते, सिर्फ हालात मायने रखते हैं।
15 जनवरी का डर और विपक्ष की एकता की परीक्षा
आने वाले 15 जनवरी को होने वाले नगर निगम चुनाव अब महाराष्ट्र की सियासत का अग्निपरीक्षा बन चुके हैं। बीजेपी और शिंदे गुट पहले से ही मजबूत संगठन और संसाधनों के साथ मैदान में हैं। उनके मुकाबले विपक्ष बिखरा हुआ नजर आए, यह जोखिम कोई भी नहीं लेना चाहता। यही डर अब विपक्षी दलों को एक-दूसरे के करीब ला रहा है। संजय राउत का यह कहना कि “बीजेपी को हराना है तो साथ लड़ना होगा,” विपक्षी खेमे की मजबूरी और सच्चाई दोनों को उजागर करता है। सवाल यही है कि क्या यह एकता सिर्फ चुनावी जरूरत तक सीमित रहेगी या भविष्य में भी कायम रह पाएगी? क्या कांग्रेस और उद्धव ठाकरे गुट अपने मतभेद भुलाकर साझा रणनीति बना पाएंगे? और राज ठाकरे फैक्टर का क्या होगा? इन तमाम सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आएंगे। फिलहाल इतना तय है कि निकाय चुनाव नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति का गेम बदल दिया है और 15 जनवरी से पहले कई और चौंकाने वाले सियासी मोड़ देखने को मिल सकते हैं।
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