UP Assembly Session: उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान हुए हंगामे के बाद विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना का भावुक बयान चर्चा का विषय बन गया। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही उन्होंने विधायकों को संबोधित करते हुए कहा कि अब उन्हें यह सोचने की जरूरत महसूस हो रही है कि क्या वह इस जिम्मेदारी के योग्य हैं या नहीं। उन्होंने कहा कि पिछले साढ़े चार वर्षों में उन्होंने पूरी ईमानदारी से सदन चलाने की कोशिश की, लेकिन हाल की घटनाओं ने उन्हें आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। हालांकि उन्होंने अपने इस्तीफे की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की, लेकिन उनकी बातों ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
लोकतंत्र में बहस जरूरी, लेकिन भाषा की मर्यादा भी उतनी ही अहम
सतीश महाना ने कहा कि लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष के बीच बहस, असहमति और सवाल-जवाब होना स्वाभाविक है, लेकिन हर परिस्थिति में भाषा और व्यवहार की मर्यादा बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सदन में जो कुछ हुआ, उससे उन्हें गहरा दुख पहुंचा है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि विधायक शपथ लेते समय सदन और उसके नियमों का सम्मान करने का संकल्प लेते हैं। उनके अनुसार यदि जनप्रतिनिधि ही मर्यादा का पालन नहीं करेंगे तो जनता के बीच गलत संदेश जाएगा। उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान में नहीं, बल्कि उसे लागू करने वाले लोगों के व्यवहार में कमी आने पर लोकतंत्र कमजोर होता है।
पुराने घटनाक्रम का किया जिक्र, सभी दलों से की अपील
अपने संबोधन में विधानसभा अध्यक्ष ने पुराने घटनाक्रमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब पहले भी सदन में कुछ विधायकों ने अनुचित व्यवहार किया था, तब उन्होंने उसका खुलकर विरोध किया था, चाहे मामला किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा रहा हो। उन्होंने याद दिलाया कि जब एक बार सदन में कुछ विधायकों ने विरोध के दौरान अपनी शर्ट उतार दी थी, तब उन्होंने कहा था कि इससे पूरे सदन की गरिमा प्रभावित हुई है। इसी तरह उन्होंने यह भी बताया कि पहले किसी नेता के खिलाफ की गई आपत्तिजनक टिप्पणी का भी उन्होंने विरोध किया था। उन्होंने सभी विधायकों से अपील की कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विधानसभा की गरिमा बनाए रखने में सहयोग करें।
एक विधायक के व्यवहार पर जताई नाराजगी
सतीश महाना ने बिना किसी विधायक का नाम लिए कहा कि सदन के एक ऐसे सदस्य के व्यवहार से उन्हें सबसे ज्यादा निराशा हुई, जिसे वह अब तक अनुशासित और जिम्मेदार मानते थे। उन्होंने कहा कि सदन के भीतर समझाने के बावजूद बाहर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया, वह बेहद दुखद था। विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि उनका राजनीतिक जीवन अब अंतिम दौर में है और उनकी इच्छा सिर्फ इतनी है कि वह इस संस्था का सम्मान बढ़ाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करें। उन्होंने सभी विधायकों से आग्रह किया कि व्यक्तिगत और राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन विधानसभा की गरिमा और लोकतांत्रिक परंपराओं को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
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