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महंगी चीनी से बिगड़ सकता है यूपी का चुनावी गणित! क्या 2027 में योगी सरकार को चुकानी पड़ेगी कीमत?

यूपी में बढ़ती चीनी कीमतों को लेकर गन्ना किसान और विपक्ष योगी सरकार पर हमलावर हैं। जानिए चीनी महंगाई और गन्ने के दाम का 2027 विधानसभा चुनाव पर क्या असर पड़ सकता है।

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उत्तर प्रदेश में चीनी की बढ़ती कीमत अब सिर्फ रसोई के बजट तक सीमित मामला नहीं रह गया है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इसके राजनीतिक असर को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। एक तरफ आम लोगों को महंगी चीनी का सामना करना पड़ रहा है, तो दूसरी तरफ गन्ना किसान अपनी फसल के बेहतर दाम की मांग उठा रहे हैं। किसान संगठनों का कहना है कि अगर चीनी की कीमत बढ़ रही है तो उसका फायदा किसानों को भी मिलना चाहिए। विपक्ष ने भी महंगाई और किसानों की समस्याओं को लेकर योगी सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है।

गन्ने के दाम को लेकर किसानों में नाराजगी

उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में किसान गन्ने की खेती पर निर्भर हैं। राज्य की करीब 121 चीनी मिलों में 2025-26 के पेराई सत्र में गन्ने की खरीद और पेराई हुई। पश्चिमी यूपी के मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, बिजनौर, सहारनपुर और अमरोहा जैसे जिलों में गन्ना किसानों की संख्या काफी अधिक है। ऐसे में चीनी और गन्ने की कीमत का मुद्दा यहां चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है। भारतीय किसान यूनियन टिकैत गुट से जुड़े किसान नेता आलोक वर्मा ने चीनी के दाम बढ़ने का हवाला देते हुए गन्ने का रेट बढ़ाकर 700 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की है। उनका तर्क है कि जब बाजार में चीनी महंगी हो रही है तो किसानों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए।

विपक्ष ने महंगाई पर सरकार को घेरा

चीनी की महंगाई को लेकर समाजवादी पार्टी ने भी सरकार पर हमला बोला है। पार्टी की प्रवक्ता पूजा शुक्ला ने कहा कि चीनी रोजमर्रा की जरूरत की चीज है और इसकी कीमत बढ़ने का सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। उन्होंने किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने का भी आरोप लगाया। वहीं वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला के मुताबिक चीनी के दाम बढ़ने के पीछे मौसम, उत्पादन और बाजार से जुड़े कई कारण हो सकते हैं। यूपी के अलावा महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी उत्पादन पर असर पड़ने की बात सामने आई है। एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी बहस चल रही है, हालांकि सरकार का कहना है कि मौजूदा महंगाई की वजह बड़ी मात्रा में चीनी का एथेनॉल में इस्तेमाल होना नहीं है। सरकार बाजार में आपूर्ति बढ़ाने, बाहर से चीनी मंगाने और जमाखोरी पर कार्रवाई जैसे कदम उठा रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीनी और गन्ने का मुद्दा 2027 के चुनाव में सरकार के लिए चुनौती बनेगा?

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