उत्तर प्रदेश में यूपी पंचायत चुनाव को लेकर आधिकारिक तौर पर भले ही यह कहा जा रहा हो कि तैयारियां चल रही हैं, लेकिन जमीनी हालात कुछ और ही संकेत दे रहे हैं। सबसे बड़ा रोड़ा केंद्र सरकार की प्रस्तावित जनगणना 2027 से जुड़ा है, जिसकी शुरुआती प्रक्रिया यानी हाउस लिस्टिंग अप्रैल 2026 से शुरू होनी है। यह प्रक्रिया अपने आप में इतनी व्यापक है कि इसमें प्रदेश भर के लाखों शिक्षक, लेखपाल, पंचायत सचिव और अन्य सरकारी कर्मचारी लगाए जाते हैं। यही वही मानव संसाधन है, जिस पर पंचायत चुनाव की पूरी व्यवस्था निर्भर करती है। ऐसे में एक ही समय पर दो बड़े लोकतांत्रिक काम कराना प्रशासन के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। अधिकारी स्तर पर यह चिंता खुलकर सामने आ रही है कि अगर हाउस लिस्टिंग और पंचायत चुनाव एक साथ हुए, तो न चुनाव निष्पक्ष ढंग से हो पाएंगे और न ही जनगणना का काम सुचारू रहेगा। यही वजह है कि अंदरखाने में यह चर्चा तेज हो गई है कि यूपी पंचायत चुनाव को आगे खिसकाना ही व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
परिसीमन, पुनर्गठन और अधूरी तैयारियां
यूपी पंचायत चुनाव में देरी की दूसरी बड़ी वजह ग्राम पंचायतों का पुनर्गठन और परिसीमन है। बीते कुछ वर्षों में सैकड़ों गांव नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायत क्षेत्रों में शामिल किए गए हैं। इसका सीधा असर पंचायतों की सीमाओं, वार्डों की संख्या और प्रतिनिधित्व के स्वरूप पर पड़ा है। जब तक नए परिसीमन का अंतिम प्रकाशन नहीं होता, तब तक यह तय ही नहीं हो सकता कि किस पंचायत में कितने वार्ड होंगे और कौन सा इलाका किस वार्ड में जाएगा। यही नहीं, परिसीमन पूरा हुए बिना आरक्षण तय करना और वोटर लिस्ट को अंतिम रूप देना भी संभव नहीं है। चुनाव आयोग से जुड़े सूत्र मानते हैं कि यह प्रक्रिया कागजों में जितनी आसान दिखती है, जमीन पर उतनी ही जटिल है। कई जिलों में परिसीमन को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं, जिनका निस्तारण समय ले रहा है। ऐसे में यूपी पंचायत चुनाव को तय समय सीमा में कराना और मुश्किल होता जा रहा है।
आरक्षण का फॉर्मूला और पिछली गलतियों का डर
आरक्षण का मुद्दा भी यूपी पंचायत चुनाव में देरी की बड़ी वजह बनकर उभरा है। सरकार के सामने यह सवाल है कि क्या 2021 के पंचायत चुनाव में लागू आरक्षण को ही आधार माना जाए या फिर नया चक्रानुक्रम लागू किया जाए। ओबीसी आरक्षण को लेकर पिछली बार जो कानूनी और राजनीतिक विवाद हुआ था, उसकी टीस अभी तक खत्म नहीं हुई है। उस समय अदालतों की फटकार और विपक्ष के हमलों ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया था। अब एक बार फिर डेडीकेटेड बैकवर्ड क्लास कमीशन की रिपोर्ट, जातीय जनगणना की मांग और सामाजिक संतुलन जैसे मुद्दे सरकार को बेहद सतर्क बना रहे हैं। कोई भी फैसला जल्दबाजी में लेने का जोखिम सरकार नहीं उठाना चाहती। यही वजह है कि आरक्षण के नए फॉर्मूले पर सहमति बनाने में समय लग रहा है, और जब तक यह साफ नहीं हो जाता, तब तक यूपी पंचायत चुनाव की तारीख तय करना भी मुश्किल माना जा रहा है।
विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी छाया
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यूपी पंचायत चुनाव पर 2027 के विधानसभा चुनाव की गहरी छाया साफ नजर आती है। सत्ताधारी भाजपा हो या विपक्षी सपा, दोनों ही दल पंचायत चुनाव को विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कराने के मूड में नहीं दिख रहे। नेताओं का मानना है कि पंचायत चुनाव में ब्लॉक और जिला पंचायत स्तर पर टिकट को लेकर जबरदस्त खींचतान होती है। एक सीट पर टिकट मिलते ही कई नेता नाराज हो जाते हैं, और यही नाराजगी बाद में विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। गांव की राजनीति में गुटबाजी खुलकर सामने आती है, जिसका असर पूरे संगठन पर पड़ता है। यही वजह है कि सपा पहले ही पंचायत चुनाव न लड़ने की घोषणा कर चुकी है, जबकि भाजपा के भीतर भी इसे लेकर असमंजस की स्थिति है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर पंचायत चुनाव के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आए, तो इसका मनोवैज्ञानिक असर विधानसभा चुनाव के माहौल पर पड़ेगा। ऐसे में यह आशंका मजबूत होती जा रही है कि यूपी पंचायत चुनाव को जानबूझकर 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद कराया जाए, ताकि राजनीतिक नुकसान से बचा जा सके।
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