Basti News: उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में एक ऐसी पहल सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने बड़ी से बड़ी चुनौती भी छोटी पड़ जाती है। वर्षों से गंदगी, प्लास्टिक और जलकुंभी की वजह से अपनी पहचान खो रही पौराणिक मनोरमा नदी को नया जीवन देने का काम युवा समाजसेवी आकाश गुप्ता और उनकी टीम ने किया है। जिस नदी को लोग धीरे-धीरे खत्म होता देख रहे थे, उसे बचाने के लिए कुछ युवाओं ने खुद मैदान में उतरने का फैसला किया। उनकी मेहनत और समर्पण का असर इतना बड़ा हुआ कि इस अभियान की चर्चा देशभर में होने लगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इस प्रयास की सराहना की।
60 दिनों तक चला सफाई अभियान
आकाश गुप्ता ने शुरुआत अकेले की थी, लेकिन उनका जज्बा देखकर अन्य युवा भी साथ जुड़ते चले गए। जल्द ही 6 से 7 लोगों की एक टीम तैयार हो गई, जिसने लगातार 60 दिनों तक नदी की सफाई का अभियान चलाया। टीम के सदस्य रोजाना कई घंटे नदी में उतरकर प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन, कूड़ा-कचरा और जलकुंभी हटाने में जुटे रहे। इस दौरान करीब 700 किलो से अधिक कचरा नदी से बाहर निकाला गया। सफाई अभियान के दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा। दूषित पानी, संक्रमण का खतरा और सांप-बिच्छुओं का डर हर दिन मौजूद रहता था, लेकिन टीम ने अपने लक्ष्य से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
सोशल मीडिया से लोगों को किया जागरूक
नदी की सफाई के साथ-साथ आकाश और उनकी टीम ने लोगों को जागरूक करने का भी काम किया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो और तस्वीरें साझा कर उन्होंने लोगों को बताया कि छोटी-छोटी लापरवाहियां किस तरह नदियों को प्रदूषित कर रही हैं। इस अभियान का असर यह हुआ कि स्थानीय लोग भी नदी संरक्षण के महत्व को समझने लगे। धीरे-धीरे क्षेत्र के कई लोगों ने सफाई अभियान में सहयोग देना शुरू किया। आज मनोरमा नदी पहले की तुलना में काफी स्वच्छ दिखाई दे रही है। नदी के किनारे फिर से लोगों की आवाजाही बढ़ी है और पशु-पक्षियों को भी इसका लाभ मिलने लगा है।
नई उम्मीद बनकर उभरी युवाओं की पहल
मनोरमा नदी पूर्वांचल की प्राचीन और धार्मिक महत्व वाली नदियों में मानी जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसका संबंध क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। समय के साथ बढ़ते प्रदूषण और उपेक्षा ने इसकी स्थिति खराब कर दी थी, लेकिन अब युवाओं की इस मुहिम ने लोगों के भीतर नई उम्मीद जगा दी है। आकाश गुप्ता और उनकी टीम का प्रयास केवल नदी की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण का एक प्रेरणादायक संदेश भी बन गया है। उनकी यह पहल दिखाती है कि यदि समाज के लोग जिम्मेदारी के साथ आगे आएं तो प्राकृतिक धरोहरों को फिर से जीवित किया जा सकता है।
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