दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों और कामकाजी युवाओं के लिए रहने का प्रमुख गढ़ माने जाने वाले सत्य निकेतन इलाके में एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही की खौफनाक तस्वीर सामने आई है। रविवार को यहां एक 30 साल पुरानी जर्जर पीजी बिल्डिंग भरभराकर गिर गई, जिसमें दबकर 6 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई और कई लोग अब भी जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। संकरी गलियों में नियमों को ताक पर रखकर खड़ी की गई ये अवैध इमारतें और लगातार बढ़ाई जा रहीं मंजिलें दिल्ली के लिए एक बड़ा नासूर बन चुकी हैं। यूनिवर्सिटी में अपने सुनहरे भविष्य का सपना लेकर आने वाले बच्चे और उनके परिवार इस बात से अनजान होते हैं कि कब सिस्टम की ढिलाई उनके जीवन का अंत बन जाएगी।
एक साल में 6 बड़े हादसे और 35 से ज्यादा मौतें
राजधानी दिल्ली में इमारतों के ढहने का यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि पिछले एक साल के भीतर ऐसे 6 बड़े हादसे हो चुके हैं जिनमें 35 से अधिक बेकसूर लोगों की जान जा चुकी है। अप्रैल 2025 में मुस्तफाबाद की चार मंजिला इमारत ढहने से 11 लोगों की जान चली गई थी, तो वहीं मई 2025 में पहाड़गंज में बेसमेंट धंसने से 3 मजदूरों की मौत हो गई थी। इसके बाद जुलाई 2025 में वेलकम इलाके में पुरानी रिहायशी इमारत गिरने से बड़ा हादसा हुआ। साल 2026 की शुरुआत से ही यह सिलसिला बदस्तूर जारी है, जहां मई में साकेत मेट्रो स्टेशन के पास सैदुलाजाब में पांच मंजिला इमारत गिरने से 6 लोगों की जान गई और जुलाई में रोहिणी में निर्माणाधीन इमारत ढहने से 3 मजदूर काल के गाल में समा गए।
अवैध निर्माण और भ्रष्टाचार पर मौन प्रशासन
इन तमाम त्रासदियों के बाद एक सवाल जो हर नागरिक के जेहन में उठता है, वह यह है कि आखिर अवैध निर्माण और बिना अनुमति के खड़ी हो रही बहुमंजिला इमारतों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की आंखों के सामने नियमों को ताक पर रखकर पुरानी इमारतों पर अवैध रूप से मंजिलें खड़ी कर दी जाती हैं, लेकिन जिम्मेदार विभागों को नींद तभी खुलती है जब मलबे के नीचे से लाशें बाहर निकलती हैं। कमर्शियल बिजनेस और ज्यादा किराए के लालच में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और जब कोई बड़ा हादसा होता है, तो कागजी औपचारिकताएं और जांच कमेटियों के गठन के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगता।
सुरक्षा और जवाबदेही पर बड़े सवाल
दिल्ली की संकरी गलियों में बिना किसी तकनीकी नक्शे और कमजोर नींव के खड़ी ये इमारतें आने वाले समय में और भी बड़े खतरों की दावत दे रही हैं। यदि समय रहते दिल्ली सरकार और नगर निगम ने जर्जर इमारतों का सर्वे कर सख्त कार्रवाई नहीं की, तो ऐसे हादसे आगे भी अनगिनत परिवारों के उजड़ने का कारण बनते रहेंगे। अब देखना यह होगा कि सत्य निकेतन हादसे के बाद क्या प्रशासन सिर्फ मुआवजे की घोषणा तक सीमित रहता है या फिर इन अवैध और जानलेवा इमारतों पर कोई ठोस बुलडोजर एक्शन देखने को मिलता है।
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