UP Election: यूपी के चुनाव में महिलाओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। CSDS-Lokniti के सर्वे में 30.2 प्रतिशत उत्तरदाता गृहिणियां थीं। ऐसे में महंगाई, राशन, गैस, परिवार की आमदनी और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे मुद्दे इस वर्ग के लिए अहम हो सकते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी गृहिणियां किसी एक पार्टी या मुद्दे के पक्ष में मतदान करती हैं। लेकिन परिवार के खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों से उनका सीधा जुड़ाव चुनावी फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
किसान-मजदूरों का आंकड़ा भी बड़ा
सर्वे में किसान, भूमिहीन कृषि मजदूर और सामान्य मजदूरों को मिलाकर करीब 29.4 प्रतिशत हिस्सेदारी सामने आई। इनमें 13.6 प्रतिशत किसान, 8.4 प्रतिशत भूमिहीन कृषि मजदूर और 7.4 प्रतिशत सामान्य मजदूर थे। इस वर्ग के लिए खेती की लागत, फसल का दाम, रोजगार और आमदनी जैसे सवाल सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि किसानों के बीच सरकारी तय कीमतों को लेकर संतुष्टि और असंतुष्टि दोनों तरह की राय मौजूद थी। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए ग्रामीण वोटरों के स्थानीय मुद्दे अहम बने रहेंगे।
बुजुर्ग वोटर भी कम नहीं, परिवार के फैसलों में हो सकता है असर
घर पर रहने वाले बुजुर्गों की हिस्सेदारी सर्वे में 7.7 प्रतिशत रही। इसके अलावा 56 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों की कुल हिस्सेदारी 19.2 प्रतिशत दर्ज की गई। इस वर्ग के लिए सरकारी सहायता, सुरक्षा, परिवार की आर्थिक स्थिति और सरकार की योजनाओं का लाभ जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। कई परिवारों में बुजुर्गों की राय चुनावी चर्चा का हिस्सा बनती है, इसलिए राजनीतिक दल इस वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
सिर्फ Gen-Z पर फोकस करना क्यों पड़ सकता है भारी?
सर्वे में 25 साल तक की उम्र वाले उत्तरदाताओं की हिस्सेदारी 12.3 प्रतिशत थी। युवा वोटर रोजगार, शिक्षा और सोशल मीडिया जैसे मुद्दों पर प्रभावी भूमिका निभाते हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यूपी का चुनावी गणित इससे कहीं बड़ा है। 2022 के सर्वे में 63.4 प्रतिशत लोगों ने महंगाई को अपने मतदान फैसले पर बहुत या काफी असर डालने वाला बताया था। वहीं विकास के मामले में यह आंकड़ा 73.8 प्रतिशत और बेरोजगारी के मामले में करीब 70.7 प्रतिशत रहा। यानी चुनाव में रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में पार्टियों के लिए Gen-Z के साथ गृहिणी, किसान-मजदूर और बुजुर्ग वोटरों को साधना बड़ी चुनौती होगी।
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