उत्पादन में गिरावट और सप्लाई चेन की दिक्कतें
प्याज के दामों में अचानक आई इस भारी तेजी के पीछे मुख्य वजह खरीफ फसल के उत्पादन में आई कमी और सप्लाई चेन का असंतुलन है। महाराष्ट्र, जो देश का एक प्रमुख उत्पादक राज्य है, वहां खरीफ प्याज के उत्पादन में 5 से 7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा, मानसून की अनिश्चितता, बुवाई में देरी और रबी व खरीफ फसलों के बीच की समयावधि में अंतर होने के कारण बाजार में सप्लाई काफी प्रभावित हुई है। हालांकि कृषि मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक कुल उत्पादन पिछले साल के लगभग बराबर यानी 307 लाख टन रहने की उम्मीद है, लेकिन त्योहारी सीजन और शुरुआती खरीफ संकट के कारण थोक मंडियों में कीमतें तेजी से ऊपर चली गई हैं।
राजनीति में भूचाल लाने की ताकत रखता है ‘कांदा’
भारत के राजनीतिक इतिहास में प्याज की कीमतों का एक अलग ही रसूख रहा है। इसे हमेशा से सत्ता की चाल बदलने वाला कमोडिटी माना जाता है। साल 1980 के लोकसभा चुनाव से लेकर 1998 में दिल्ली की सत्ता तक, कई सरकारों को केवल प्याज के महंगे होने के कारण नुकसान उठाना पड़ा था। यही कारण है कि देश का कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर जोखिम नहीं उठाना चाहता। आम जनता के खाने की थाली से गायब होता ‘कांदा’ सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने के लिए काफी है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि महंगाई का यह तड़का किसी भी राजनीतिक दल के समीकरण को बिगाड़ सकता है।
‘कांदा एक्सप्रेस’ और सरकारी नियंत्रण की रणनीति
बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने युद्धस्तर पर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। जमाखोरी पर लगाम लगाने के साथ-साथ सरकार बफर स्टॉक को सीधे बाजार में उतारने की योजना बना रही है। इसके लिए एक बार फिर से विशेष ट्रेन यानी ‘कांदा एक्सप्रेस’ को पटरी पर लाने का फैसला किया गया है। नासिक से दिल्ली, चेन्नई और अन्य बड़े शहरों के लिए चलाई जाने वाली यह स्पेशल मालगाड़ी कम लागत और कम समय में प्याज की आपूर्ति को सुचारू बनाएगी, जिससे मांग और आपूर्ति के अंतर को पाटा जा सके। अब देखना यह है कि क्या यह एक्सप्रेस ट्रेन आम जनता को राहत दिला पाती है या महंगाई का यह दौर अभी और जारी रहेगा।
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