देश के कई हिस्सों में चीनी की बढ़ती कीमत ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। कई शहरों में खुदरा बाजार में चीनी का भाव करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। इसका असर घर के बजट के साथ चाय की दुकानों, मिठाई कारोबार और खाद्य उद्योग पर भी पड़ रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि चीनी की कीमत आखिर तय कौन करता है? क्या किसान इसका भाव तय करता है या सरकार की इसमें बड़ी भूमिका है? दरअसल, गन्ने की कीमत और चीनी के बाजार भाव को तय करने की प्रक्रिया अलग-अलग है।
सरकार के हाथ में चीनी के बाजार पर बड़ा नियंत्रण
भारत में चीनी क्षेत्र पर केंद्र सरकार की अहम भूमिका है। जरूरी वस्तु अधिनियम और इससे जुड़े नियमों के तहत सरकार चीनी के उत्पादन, स्टॉक, बिक्री, आयात और निर्यात पर नजर रख सकती है। घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव रोकने के लिए सरकार समय-समय पर अलग-अलग कदम उठाती है। सरकार चीनी मिलों के लिए बिक्री कोटा तय कर सकती है और जरूरत के हिसाब से आयात-निर्यात से जुड़े फैसले भी ले सकती है। मौजूदा तेजी के बीच सरकार ने घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। बड़े खरीदारों पर स्टॉक लिमिट लगाने जैसे कदम भी कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए हैं।
किसान चीनी का नहीं, गन्ने का भाव तय करता है
किसानों की भूमिका मुख्य रूप से गन्ने की कीमत से जुड़ी होती है। केंद्र सरकार गन्ने के लिए FRP यानी उचित और लाभकारी मूल्य तय करती है। 2025-26 चीनी सीजन के लिए FRP 355 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है, जो 10.25 प्रतिशत की बेसिक रिकवरी दर से जुड़ी है। रिकवरी ज्यादा होने पर किसानों को अतिरिक्त भुगतान भी मिलता है। कुछ राज्यों में केंद्र की FRP से अलग SAP यानी State Advised Price भी लागू है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में गन्ने के लिए अलग राज्य स्तरीय कीमत तय की जाती है। इसका मतलब यह है कि किसान सीधे बाजार में चीनी का खुदरा भाव तय नहीं करता, बल्कि उसे गन्ने की तय कीमत के आधार पर भुगतान मिलता है।
चीनी महंगी होने के पीछे सिर्फ किसान जिम्मेदार नहीं
चीनी की कीमत बढ़ने के पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। बाजार में मांग और सप्लाई का संतुलन, चीनी का उत्पादन, मिलों के पास उपलब्ध स्टॉक और सरकार की नीतियां कीमत को प्रभावित करती हैं। इसके अलावा गन्ने से चीनी बनाने के साथ एथेनॉल उत्पादन भी चीनी उद्योग की अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। थोक बाजार में भी पिछले कुछ समय में कीमत बढ़ने की बात सामने आई है। ऐसे में सरकार के लिए एक तरफ किसानों को गन्ने का उचित भुगतान दिलाना और दूसरी तरफ आम लोगों के लिए चीनी की कीमत को नियंत्रण में रखना बड़ी चुनौती है। यही वजह है कि चीनी के भाव को केवल किसान या केवल सरकार द्वारा तय किया गया भाव समझना सही नहीं होगा। बाजार में अंतिम कीमत कई कारकों के असर से तय होती है।
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