संसद के मॉनसून सत्र के दौरान पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने राम मंदिर चंदा मामले को लेकर अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन किया। वह भगवा वस्त्र और साधु के वेश में संसद परिसर पहुंचे और इस मुद्दे को उठाया। उनके इस प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक बहस के साथ-साथ धार्मिक संगठनों की भी प्रतिक्रिया आने लगी। कई संतों और महंतों ने इसे संसद की गरिमा और सनातन परंपरा से जुड़ा गंभीर विषय बताया। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रदर्शन के लिए करना उचित नहीं माना जा सकता। इसी वजह से यह मामला अब संसद से निकलकर धार्मिक जगत तक पहुंच गया है।
अयोध्या से मथुरा तक संतों ने उठाए सवाल
इस मामले पर उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख धार्मिक स्थलों के संतों ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। भाजपा सांसद और संत साक्षी महाराज ने कहा कि संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच पर इस तरह का प्रदर्शन सही परंपरा नहीं है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से इस पूरे मामले पर उचित कार्रवाई करने की मांग भी की। वहीं मथुरा के चित्रगुप्त पीठाधीश्वर स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने कहा कि सांसद का पद अपने आप में सम्मानजनक होता है और भगवा वस्त्रों का इस तरह इस्तेमाल करना संत समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। अयोध्या के संत सत्येंद्र दास वेदांती ने भी इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा कि धार्मिक पहचान का राजनीतिक उपयोग समाज में गलत संदेश देता है। उन्होंने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की बात कही।
भगवा वस्त्र की मर्यादा पर उठी बहस
महामंडलेश्वर विष्णु दास महाराज ने कहा कि भगवा रंग केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है। उनका कहना है कि इसका इस्तेमाल किसी भी राजनीतिक संदेश या विरोध प्रदर्शन के लिए नहीं किया जाना चाहिए। आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर ने भी इस घटना को सनातन परंपरा के लिए दुखद बताया। उन्होंने कहा कि संसद में हुई इस घटना से कई लोगों की धार्मिक भावनाएं प्रभावित हुई हैं। रामदल ट्रस्ट के अध्यक्ष कल्कि राम ने भी कहा कि भगवा वस्त्र का अपना धार्मिक महत्व है और इसे राजनीतिक विरोध का माध्यम बनाने से विवाद पैदा होना स्वाभाविक है। संत समाज का मानना है कि धार्मिक प्रतीकों का सम्मान हर परिस्थिति में बनाए रखना जरूरी है।
कार्रवाई की मांग के साथ तेज हुई राजनीतिक चर्चा
हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास ने कहा कि संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है, इसलिए वहां हर जनप्रतिनिधि को मर्यादा का पालन करना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या धार्मिक वेशभूषा में इस तरह का विरोध लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप है। इस घटना के बाद कई संतों ने एक स्वर में कहा कि धर्म और राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। फिलहाल पप्पू यादव की ओर से संत समाज की इन प्रतिक्रियाओं पर कोई विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राजनीति दोनों में चर्चा का विषय बना रह सकता है।
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