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दैवीय शक्ति या कुछ और? श्रावस्ती में 6 दिन से एक ही खेत के चक्कर काट रही गाय, उमड़ी ग्रामीणों की भीड़

उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में एक गाय लगातार 6 दिनों से खेत में गोल-गोल परिक्रमा कर रही है। ग्रामीण इसे दैवीय चमत्कार मानकर पूज रहे हैं, जबकि डॉक्टर इसे गंभीर मानसिक बीमारी बता रहे हैं।

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उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में इन दिनों एक ऐसी घटना चर्चा का विषय बनी हुई है, जिसे देखकर हर कोई हैरान है। ग्राम पंचायत बसभरिया में पिछले छह दिनों से एक गाय लगातार एक ही खेत में गोल-गोल घूमकर परिक्रमा कर रही है। यह अनोखा नजारा गांव निवासी सिपाही लाल केवट के खेत में देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस सिलसिले की शुरुआत बीते शुक्रवार को हुई थी, जब इस गाय को पहली बार प्रसिद्ध झारखंडी मंदिर परिसर में देखा गया था। मंदिर से लौटने के तुरंत बाद, गाय ने सिपाही लाल के खेत में आकर गोल चक्कर लगाना शुरू कर दिया। पहले दिन तो ग्रामीणों ने इसे एक सामान्य सी बात समझा और नजरअंदाज कर दिया, लेकिन जब दूसरे और तीसरे दिन भी गाय का यह क्रम नहीं टूटा, तो धीरे-धीरे यह बात पूरे इलाके में आग की तरह फैल गई। आज आलम यह है कि श्रावस्ती ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों जैसे बहराइच, बलरामपुर और गोंडा से भी लोग गाड़ियों में भरकर इस ‘दैवीय चमत्कार’ को देखने और गाय का आशीर्वाद लेने पहुंच रहे हैं। लोग चिलचिलाती धूप में पेड़ों की छांव में बैठकर घंटों इस नजारे को देखते हैं और श्रद्धा से गाय के पैर छू रहे हैं।

रहस्यमयी दिनचर्या: न खाती है रोटी-गुड़, टोकने पर फिर से शुरू कर देती है चक्कर

इस गाय की दिनचर्या और व्यवहार ने लोगों की आस्था को और ज्यादा मजबूत कर दिया है। ग्रामीणों का दावा है कि आमतौर पर गायें लोगों के हाथ से रोटी, गुड़ या हरा चारा आसानी से खा लेती हैं, लेकिन यह गाय किसी के भी द्वारा दिए गए भोजन को सूंघती तक नहीं है। परिक्रमा के दौरान यदि कोई श्रद्धालु श्रद्धावश उसके पैर छूने की कोशिश करता है या उसे कुछ खिलाने का प्रयास करता है, तो गाय विचलित नहीं होती; बल्कि वह वहीं से मुड़कर नए सिरे से अपनी परिक्रमा शुरू कर देती है। ग्रामीणों ने बताया कि गाय पूरे दिन बिना थके और बिना बैठे लगातार चलती रहती है। जब शाम ढलती है, तो वह बेहद मामूली मात्रा में थोड़ा सा हरा चारा खाती है और पानी पीती है। इसके बाद रात के समय वह केवल कुछ ही घंटों के लिए जमीन पर बैठती है और सुबह होते ही फिर से उसी ऊर्जा के साथ खेत के चक्कर काटना शुरू कर देती है। इस अजीबोगरीब और अनुशासित व्यवहार को देखकर ग्रामीणों का विश्वास पक्का हो गया है कि इसके पीछे कोई न कोई अलौकिक या दैवीय शक्ति काम कर रही है।

विज्ञान बनाम आस्था: डॉक्टरों ने बताया मानसिक बीमारी, इलाज रोकने पर अड़े ग्रामीण

एक तरफ जहाँ आम जनता इसे भगवान का रूप मानकर पूजने में लगी है, वहीं दूसरी तरफ विज्ञान और चिकित्सा जगत की राय इसके बिल्कुल उलट है। इस मामले की जानकारी मिलने पर रविवार को पयागपुर के एक पशु चिकित्सक ने मौके पर पहुंचकर गाय की जांच की थी और उसे कुछ दवाइयां व इंजेक्शन भी दिए थे। हालांकि, इलाज के कुछ ही घंटों बाद गाय ने दोबारा परिक्रमा शुरू कर दी। इस पूरे मामले पर राजकीय पशु चिकित्सालय भिनगा के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. विनय सिंह का कहना है कि यह कोई दैवीय चमत्कार नहीं, बल्कि पशुओं में होने वाली एक गंभीर मानसिक व न्यूरोलॉजिकल बीमारी (Neurological Disorder) है। डॉक्टर के मुताबिक, गाय को तुरंत एक व्यवस्थित और बड़े इलाज की सख्त जरूरत है। अगर समय पर इलाज नहीं मिला, तो लगातार चलने की वजह से गाय अत्यधिक थकान और शारीरिक कमजोरी का शिकार होकर दम भी तोड़ सकती है। लेकिन, डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अंधविश्वास और गहरी आस्था के चलते ग्रामीण अब गाय का आगे का इलाज कराने से साफ इनकार कर रहे हैं और टीम को उसके पास फटकने भी नहीं दे रहे हैं।

आँखों के आँसू और ‘अनोखा’ दावा: जब सुई लगते ही रो पड़ी गाय!

इस पूरी घटनाक्रम में एक बेहद भावुक और हैरान करने वाला मोड़ रविवार को आया, जिसने ग्रामीणों के अंधविश्वास को चरम पर पहुंचा दिया। ग्रामीणों के अनुसार, जब पयागपुर के डॉक्टर ने रविवार को गाय को रस्सी से बांधकर जबरन इंजेक्शन लगाया, तो दर्द या बेचैनी के कारण गाय की आँखों से लगातार आँसू बहने लगे। आंसू इतने ज्यादा थे कि गाय की आँखों के नीचे बाकायदा काले निशान बन गए। ग्रामीणों ने इस स्थिति को अपनी आस्था से जोड़ते हुए यह निष्कर्ष निकाल लिया कि गाय अपना इलाज बिल्कुल नहीं करवाना चाहती है और डॉक्टरों की दवाइयों से उसे कष्ट हो रहा है। इसके बाद, ग्रामीणों ने विरोध करके गाय को बंधनों से तुरंत मुक्त करवा दिया। स्थानीय लोगों का दावा है कि जैसे ही गाय की रस्सी खोली गई, वैसे ही उसकी आँखों से आंसू गिरने बंद हो गए और उसने बिना किसी शिकायत के दोबारा शांति से परिक्रमा शुरू कर दी। ग्रामीणों के लिए यह घटना किसी बड़े दैवीय संकेत से कम नहीं थी। फिलहाल, विज्ञान और आस्था की इस कशमकश के बीच वह बेजुबान जानवर लगातार खेत के चक्कर काट रहा है, और प्रशासन के सामने आस्था के इस सैलाब को संभालने के साथ-साथ जानवर की जान बचाने की दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है।

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