उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित और बड़े राजनीतिक मर्डर्स में से एक, बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड में एक नया मोड़ आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी आबिद को बड़ी राहत देते हुए उसकी जमानत मंजूर कर ली है। कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ आबिद को जेल से बाहर आने की इजाजत दे दी है। हाईकोर्ट के दो जजों की बेंच ने यह फैसला सुनाया। इस फैसले के बाद सालों पुराने इस मामले की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।
अदालत में वकील की दलीलों के बाद मिली कामयाबी
जमानत की इस अर्जी पर आबिद की तरफ से कोर्ट में सीनियर वकील राजर्षि गुप्ता ने पैरवी की। उन्होंने अदालत के सामने केस से जुड़े कई कानूनी पॉइंट और सबूतों की स्थिति को रखा। वकील ने दलील दी कि जब तक इस मामले की पूरी अपील पर आखिरी फैसला नहीं आ जाता, तब तक आबिद को जमानत पर छोड़ा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की बातें सुनीं और केस के रिकॉर्ड को देखने के बाद आबिद को सशर्त जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया।
साल 2005 की खौफनाक घटना
यह मामला करीब 21 साल पुराना है, जिसने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। 25 जनवरी 2005 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के धूमनगंज इलाके में बसपा विधायक राजू पाल पर दिनदहाड़े हमला हुआ था। हमलावरों ने उन्हें चारों तरफ से घेरकर सरेआम गोलियों से भून दिया था। इस हमले में राजू पाल के साथ उनके दो दोस्तों, देवी लाल पाल और संदीप यादव की भी जान चली गई थी। इस सरेआम हुई गोलीबारी में तीन लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए थे, जिसके बाद राज्य की कानून व्यवस्था पर बड़े सवाल उठे थे।
थाने से लेकर सीबीआई और उम्रकैद तक की पूरी कहानी
पति की हत्या के बाद राजू पाल की पत्नी पूजा पाल ने धूमनगंज थाने में केस दर्ज कराया था। पहले इस केस की जांच यूपी पुलिस और सीबीसीआईडी ने की। लेकिन बाद में परिवार की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) को सौंप दी। सीबीआई की जांच और गवाहों के बयानों के आधार पर निचली अदालत ने आबिद और उसके साथियों को हत्या व साजिश रचने का दोषी पाया था और उन्हें उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई थी। इसी सजा के खिलाफ आबिद ने हाईकोर्ट में अपील की थी, जहां से अब उसे यह बड़ी राहत मिली है।
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