पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक ऐसा तूफान उठ खड़ा हुआ है, जो थमने का नाम नहीं ले रहा है। कभी सूबे की सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी के लिए अब अपनी ही पार्टी के कुनबे को बिखरने से बचाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। चुनाव हारने और मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने के बाद से ही टीएमसी नेताओं का असंतोष खुलकर सड़कों पर आने लगा है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि पार्टी के दो फाड़ होने की आशंका जताई जा रही है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LOP) की नियुक्ति को लेकर जो विवाद शुरू हुआ था, उसने अब एक बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले लिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने ममता बनर्जी की राजनीतिक साख और सांगठनिक क्षमता पर गहरे सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
फर्जी हस्ताक्षर विवाद: अपनों की बगावत या गहरी साजिश?
इस पूरे विवाद की जड़ में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी है। ममता बनर्जी ने इस पद के लिए शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम पर मुहर लगाई थी, लेकिन इस नियुक्ति के तुरंत बाद सूबे के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक बड़ा बम फोड़ दिया। सीएम शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को सीधे आरोप लगाया कि विधानसभा स्पीकर को भेजे गए समर्थन पत्र पर कुछ टीएमसी विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर (जालसाजी) किए गए थे। उन्होंने बकायदा दो टीएमसी विधायकों—रिताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा का नाम लिया, जिन्होंने खुद अपने फर्जी दस्तखत होने की शिकायत दर्ज कराई थी। इस खुलासे के बाद ममता बनर्जी ने तुरंत एक्शन लेते हुए इन दोनों विधायकों को ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के आरोप में बाहर का रास्ता दिखा दिया, जिससे पार्टी के अंदर का लावा और तेजी से सुलग उठा है।
ममता की बैठक से 60 विधायक गायब, भतीजे अभिषेक निशाने पर!
टीएमसी के भीतर चल रही इस खींचतान में सबसे हैरान करने वाली बात हाल ही में बुलाई गई एक आपातकालीन बैठक में देखने को मिली। ममता बनर्जी के आवास पर पार्टी के सभी विधायकों की बैठक बुलाई गई थी, लेकिन कुल 80 विधायकों में से केवल 20 विधायक ही वहां पहुंचे। 60 विधायकों का इस तरह बैठक से दूरी बना लेना यह साफ संकेत देता है कि बगावत की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। अंदरूनी सूत्रों और खुद पार्टी से निकाले गए विधायक संदीपन साहा के बयानों से यह साफ है कि विधायकों की यह नाराजगी ममता बनर्जी से ज्यादा उनके भतीजे और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ है। संदीपन साहा ने सीधा आरोप लगाया कि विधायकों की जिस लिस्ट पर फर्जी साइन की बात हो रही है, उसे खुद अभिषेक बनर्जी ने ही तैयार और साइन किया था।
CID की एंट्री और बीजेपी का तंज: ‘सिर्फ बुआ-भतीजे रह जाएंगे’
यह मामला अब सिर्फ राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें कानूनी कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है। फर्जी हस्ताक्षर के इस गंभीर मामले की जांच पश्चिम बंगाल सीआईडी (CID) को सौंप दी गई है। सीआईडी ने मामले में तत्परता दिखाते हुए कई तृणमूल नेताओं को नोटिस थमाया है और यहां तक कि अभिषेक बनर्जी को भी पूछताछ के लिए तलब किया था, हालांकि वे समन पर पेश नहीं हुए। इस बीच, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर दबाव तब और बढ़ गया जब सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने जिलाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। टीएमसी की इस अंतर्कलह पर चुटकी लेते हुए वरिष्ठ भाजपा नेता और राज्य सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने तंज कसा कि “पार्टी से सभी लोग भाग रहे हैं, ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में टीएमसी में सिर्फ ममता बनर्जी और उनके भतीजे ही बचेंगे।” अब देखना यह होगा कि चारों तरफ से घिरीं ममता बनर्जी इस चक्रव्यूह से अपनी पार्टी को कैसे बाहर निकाल पाती हैं।
