इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक अहम याचिका ने कानूनी और धार्मिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। आशुतोष महाराज ने अपने खिलाफ साल 2013 में खोली गई हिस्ट्रीशीट को रद्द करने की मांग करते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यह याचिका इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आशुतोष महाराज, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ दर्ज एक पाक्सो मामले में शिकायतकर्ता हैं। याचिका में उन्होंने कहा है कि उनके खिलाफ दर्ज कई मामलों में या तो वह बरी हो चुके हैं या फिर कार्रवाई पर रोक लगी हुई है। ऐसे में हिस्ट्रीशीट को जारी रखना न केवल अनुचित है, बल्कि उनकी छवि को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
कोर्ट ने मांगा जवाब, दो हफ्ते का समय
इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सरकार से इस मामले में जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। साथ ही अगली सुनवाई की तारीख 13 मई तय की गई है। कोर्ट के इस रुख से साफ है कि वह मामले को गंभीरता से देख रहा है और दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनना चाहता है। कानूनी जानकारों के अनुसार, अगर याची अपने दावों को साबित करने में सफल होते हैं, तो हिस्ट्रीशीट रद्द होने की संभावना बन सकती है।
याचिका में दावा—ज्यादातर मामलों में बरी
आशुतोष महाराज ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि उनके खिलाफ जो आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे, उनमें से कई में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है। कुछ मामलों में जांच या कार्रवाई पर रोक लगी हुई है, जबकि अन्य मामले सिविल प्रकृति के हैं और धार्मिक संपत्तियों से जुड़े विवादों से संबंधित हैं। उनका कहना है कि ऐसे मामलों के आधार पर हिस्ट्रीशीट बनाए रखना न्यायसंगत नहीं है। इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि शामली जिले के कांधला थाने में उनके खिलाफ यह हिस्ट्रीशीट खोली गई थी, जिसे अब हटाने की जरूरत है।
निगरानी रजिस्टर से नाम हटाने की भी मांग
हिस्ट्रीशीट रद्द कराने के साथ-साथ आशुतोष महाराज ने पुलिस के निगरानी रजिस्टर से भी अपना नाम हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि लगातार निगरानी में रखे जाने से उनके सामाजिक और धार्मिक कार्यों पर असर पड़ रहा है। उन्होंने खुद को श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट, मथुरा का अध्यक्ष बताते हुए कहा कि वह समाजसेवा और धार्मिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में उनके नाम का निगरानी सूची में बने रहना उनके सम्मान और कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा करता है। फिलहाल इस पूरे मामले पर सबकी नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां कोर्ट का रुख आगे की दिशा तय करेगा।
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