उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित ग्राम पंचायत चुनाव समय पर होते नहीं दिख रहे हैं, जिससे ग्रामीण राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव माना जा रहा है। वर्तमान में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है, लेकिन चुनाव प्रक्रिया में देरी के चलते इस तारीख के बाद नई व्यवस्था लागू किए जाने की तैयारी है। सरकार ग्राम प्रधानों के कार्यकाल को अस्थायी रूप से बढ़ाने के विकल्प पर विचार कर रही है। इसके तहत पंचायतों का संचालन किसी बाहरी प्रशासक को न देकर एक प्रशासकीय समिति के माध्यम से किया जा सकता है, ताकि स्थानीय लोकतांत्रिक संतुलन बना रहे।
प्रशासकीय समिति का मॉडल
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, ग्राम पंचायतों में सीधे किसी सरकारी अधिकारी को प्रशासक के रूप में तैनात करने की बजाय एक समिति गठित की जा सकती है। इस समिति में ग्राम प्रधान, पंचायत सदस्य और कुछ प्रशासनिक अधिकारी शामिल होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समिति का नेतृत्व स्वयं ग्राम प्रधान को दिए जाने की संभावना पर भी चर्चा चल रही है। इससे ग्रामीण स्तर पर असंतोष कम करने और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। पंचायती राज व्यवस्था के जानकारों का मानना है कि यह मॉडल अधिक सहभागी और संतुलित हो सकता है, क्योंकि इसमें स्थानीय प्रतिनिधियों की भागीदारी बनी रहती है।
कोर्ट में मामला और चुनावी प्रक्रिया में देरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट में पंचायत चुनाव से जुड़े मामलों की सुनवाई लगातार टलती जा रही है, जिससे प्रक्रिया और अधिक लंबी खिंचती दिख रही है। कोर्ट पहले ही चुनाव आयोग से देरी को लेकर सवाल कर चुका है, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट दिशा नहीं मिली है। इसके साथ ही मतदाता सूची को लेकर भी बड़ी देरी सामने आई है। पहले जो सूची 22 अप्रैल को जारी होनी थी, वह अब 10 जून तक टल गई है। फाइनल वोटर लिस्ट, मतदान केंद्रों की मैपिंग और वार्ड संरचना जैसे जरूरी काम अभी अधूरे हैं, जिससे चुनाव कार्यक्रम पर अनिश्चितता बनी हुई है।
आरक्षण और प्रशासनिक अड़चनों से बढ़ी मुश्किलें
चुनाव प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा ओबीसी आरक्षण को लेकर भी देखी जा रही है। अभी तक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन पूरा नहीं हो पाया है, जिसके बिना पंचायत चुनाव में आरक्षण लागू करना संभव नहीं माना जा रहा। इस वजह से पूरी चुनावी प्रक्रिया और भी लंबी खिंच सकती है। अगर यह देरी जारी रही तो पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के आसपास भी खिसक सकते हैं। इसके अलावा राजनीतिक गुटबाजी और स्थानीय स्तर पर विवादों की आशंका के कारण भी सरकारें फिलहाल जल्दबाजी से बचती दिख रही हैं। यही वजह है कि पंचायत चुनाव की स्थिति फिलहाल पूरी तरह अनिश्चित बनी हुई है।
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