दिल्ली आबकारी नीति मामले में सोमवार को बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला, जब अरविंद केजरीवाल खुद ही दिल्ली हाई कोर्ट में अपनी पैरवी करने पहुंचे। उन्होंने किसी वकील की मदद नहीं ली और सीधे अदालत के सामने अपना पक्ष रखा। केजरीवाल ने अदालत से मांग की कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा इस केस की सुनवाई से खुद को अलग करें। उनका कहना था कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई को लेकर गंभीर आशंका है। अदालत में शुरुआत होते ही जज ने स्पष्ट किया कि पहले रीक्यूज़ल (स्वयं को अलग करने) के मुद्दे पर ही सुनवाई होगी।
निचली अदालत के फैसले का दिया हवाला
केजरीवाल ने अपनी दलील में कहा कि निचली अदालत ने तीन महीने तक रोजाना सुनवाई करने के बाद उन्हें और अन्य आरोपियों को बरी किया था। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साफ माना कि यह मामला साजिश के तहत बनाया गया था और आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं था। इसके बावजूद Central Bureau of Investigation (CBI) ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। केजरीवाल ने सवाल उठाया कि जब निचली अदालत ने पूरे केस को खारिज कर दिया, तो क्या अब हाई कोर्ट उसी आधार पर अलग निष्कर्ष दे सकता है।
‘बिना सुने आदेश’ पर उठाया सवाल
केजरीवाल ने अदालत में यह भी कहा कि 9 मार्च की सुनवाई के दौरान केवल CBI मौजूद थी और बाकी पक्षों को सुने बिना ही नोटिस जारी कर दिया गया। उन्होंने इसे एकतरफा कार्रवाई बताते हुए कहा कि इससे उन्हें न्याय मिलने पर संदेह हुआ। केजरीवाल ने कहा कि रीक्यूज़ल का मुद्दा केवल जज और पक्षकार के बीच का मामला है, इसमें CBI का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पहले की टिप्पणियों में उन्हें लगभग दोषी मान लिया गया था, जो निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।
कोर्ट ने दी संतुलित प्रतिक्रिया
वहीं अदालत ने केजरीवाल की दलीलों पर संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनकी आशंकाएं व्यक्तिगत धारणा हो सकती हैं। जज ने स्पष्ट किया कि जब पहले टिप्पणियां की गई थीं, तब निचली अदालत का फैसला सामने नहीं आया था। अब ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को आगे की सुनवाई में देखा जाएगा। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर किसी भी तरह की टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। मामले की अगली सुनवाई में यह तय होगा कि जज खुद को केस से अलग करती हैं या नहीं।
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