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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी से मचा हलचल: क्या दहेज उत्पीड़न मामलों में बदलने जा रही है कानूनी सोच?

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामलों पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी किसी को परिवार के अपमान का अधिकार नहीं देती। 2010 के छत्तीसगढ़ दहेज मृत्यु केस में कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया।

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सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और पारिवारिक हिंसा से जुड़े मामलों पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए समाज में बढ़ती दहेज मानसिकता पर गंभीर चिंता जताई है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि शादी का अर्थ किसी भी स्थिति में यह नहीं है कि किसी महिला या उसके परिवार को अपमानित करने का अधिकार मिल जाए। यह टिप्पणी छत्तीसगढ़ के एक दहेज मृत्यु मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें एक महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद उसके ससुराल पक्ष के कई सदस्यों को दोषी ठहराया गया था।

2010 के मामले में दहेज मांग और प्रताड़ना का आरोप

यह मामला वर्ष 2010 का है, जब छत्तीसगढ़ में शादी के मात्र तीन वर्षों के भीतर एक महिला ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। मृतका के परिवार ने आरोप लगाया था कि उनसे लगातार कार और नकद पैसे की मांग की जा रही थी और मांग पूरी न होने पर उनकी बेटी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। अदालत ने पाया कि यह घटना दहेज मृत्यु की श्रेणी में आती है क्योंकि विवाह के सात वर्षों के भीतर असामान्य मृत्यु हुई थी। इसी आधार पर मामला भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं के तहत दर्ज किया गया था।

देवर की याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

इस मामले में पति के परिवार के कई सदस्यों को धारा 304B (दहेज मृत्यु), 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 498A (दहेज उत्पीड़न) के तहत दोषी ठहराया गया था। इसी फैसले को चुनौती देते हुए देवर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने दहेज को लेकर समाज में मौजूद मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया। अदालत ने कहा कि बहुओं और उनके परिवारों को “निचोड़ने” की प्रवृत्ति बेहद गंभीर सामाजिक समस्या है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने बताया—यह सिर्फ कानूनी नहीं, सामाजिक बीमारी भी है

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले के तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि लड़की के परिवार को बार-बार अपमानित किया गया और आर्थिक रूप से दबाव बनाने की कोशिश की गई। यहां तक कि पीड़ित परिवार द्वारा 60 हजार रुपये देने की बात कहने के बावजूद उन्हें “भिखारी” कहा गया, जो बेहद अमानवीय व्यवहार है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में केवल कानूनी सजा ही नहीं बल्कि समाज को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है। अदालत ने कहा कि दहेज की मानसिकता महिलाओं के अधिकारों और सम्मान पर सीधा हमला है, जिसे किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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