बिहार के मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह के जेल से जमानत पर लौटने के बाद उनके पैतृक गांव नदावां में जोरदार हलचल देखने को मिल रही है। इस बार गांव में भव्य अंतरराष्ट्रीय महादंगल का आयोजन किया जा रहा है। यह दंगल ‘बिहार केसरी’ रहे विवेकानंद सिंह उर्फ विवेका पहलवान की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर रखा गया है। अनंत सिंह खुद इस आयोजन की निगरानी कर रहे हैं और हाल ही में 10 बीघा जमीन में फैले मैदान का जायजा लिया। आयोजन स्थल का दायरा और तैयारी अभूतपूर्व है। मैदान को पूरी तरह समतल किया गया है और बीचों-बीच 5 फीट ऊंचा पारंपरिक अखाड़ा बनाया गया है। आयोजकों के मुताबिक, इस महादंगल में भारत के महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और बिहार के चुनिंदा पहलवानों के साथ-साथ ईरान समेत 3 देशों के नामी पहलवान भाग लेंगे। अनुमानित दर्शकों की संख्या 8 से 10 लाख के बीच हो सकती है।
अखाड़े की तैयारी और मिट्टी का रहस्य
इस महादंगल को तैयार करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक है। नदावां के मां ब्रह्मम्णी स्थल से लाल मिट्टी मंगवाई गई है। इसे कुश्ती के लिए तैयार करने में हल्दी, राई का तेल और नीम की पत्तियों का मिश्रण किया गया है। इसका मकसद पहलवानों को बेहतर पकड़ देना और चोट से बचाना है। इस तैयारी को देखकर यह साफ है कि आयोजक चाहते हैं कि युवा पीढ़ी मिट्टी के अखाड़ों से जुड़ी रहे और पारंपरिक पहलवानी का अनुभव फिर से जी सके।
विवेका पहलवान की कहानी और प्रेरणा
विवेका पहलवान की दिनचर्या आज के युवाओं के लिए हैरान करने वाली थी। रात 8 बजे सोने के बावजूद उनके पास 5-6 लीटर दूध रखा रहता था, जिसे रातभर पीते थे। साथ ही, रोजाना 8,000 दंड-बैठक और 2,000 डिप्स करते थे। व्यायाम के बाद 10 किलोमीटर दौड़ लगाते और अखाड़े में घंटों कुश्ती लड़ते। साल 1977 में ‘बिहार केसरी’ का खिताब जीतने वाले विवेका ने एशिया चैंपियन सतपाल, करतार सिंह, सुखचैन और कदीम जैसे दिग्गज पहलवानों से मुकाबला किया। उनके भतीजे और भाई कहते हैं कि आज के युवा पहलवान पहले जैसे दम-खम नहीं दिखाते। यही वजह है कि यह महादंगल युवा पीढ़ी को अखाड़े की ओर वापस लाने का सबसे बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
युवा पीढ़ी और महादंगल का महत्व
इस महादंगल का मुख्य उद्देश्य सिर्फ प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि मिट्टी के अखाड़ों में पहलवानी की पारंपरिक विरासत को जिंदा करना है। आयोजक अरविंद पहलवान का कहना है कि यह आयोजन गांव-देहात के युवाओं को मोबाइल और टीवी से दूर लाकर अखाड़ों की ओर खींचने का प्रयास है। अनंत सिंह के समर्थन और देखरेख से यह महादंगल बिहार के इतिहास में अपनी भव्यता के लिए याद रखा जाएगा। दर्शक, पहलवान और युवा सब इसे एक यादगार आयोजन मान रहे हैं।
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