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सूना घर, प्यास का बहाना और खाकी की दरिंदगी! रीवा के बिछिया थाने के ASI ने मासूम के साथ जो किया, सुनकर कांप जाएगी रूह 

मध्य प्रदेश के रीवा में रक्षक ही बना भक्षक! बिछिया थाने के ASI पर नाबालिग से दुष्कर्म के प्रयास का आरोप। जानें कैसे सूझबूझ से बची मासूम की जान

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रीवा (मध्य प्रदेश): जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक ऐसी शर्मनाक खबर सामने आई है जिसने पुलिस विभाग के चेहरे पर कालिख पोत दी है। यहाँ बिछिया थाने में पदस्थ एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर (ASI) पर एक नाबालिग लड़की ने दुष्कर्म के प्रयास का सनसनीखेज आरोप लगाया है। यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं है, बल्कि उस भरोसे का कत्ल है जो जनता खाकी वर्दी पर करती है। एक पुलिस अधिकारी, जिसे कानून का पालन कराना था, वह खुद एक मासूम की इज्जत तार-तार करने की कोशिश में लग गया। इस घटना के बाद से पूरे इलाके में आक्रोश है और पुलिस महकमे के आला अधिकारी अब डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं। लेकिन सवाल वही है कि क्या वर्दी के रसूख के आगे न्याय मिल पाएगा?

थाने से शुरू हुई ‘गंदी नजर’ और किराएदार बनने का ड्रामा

इस पूरी कहानी की शुरुआत कुछ दिन पहले हुई थी, जब पीड़ित नाबालिग लड़की किसी पारिवारिक मामले की शिकायत दर्ज कराने के लिए अपने चाचा के साथ बिछिया थाने गई थी। किसे पता था कि मदद की गुहार लेकर गई उस मासूम पर थाने में ही तैनात एक दरिंदे की नजर टिक जाएगी। आरोप है कि थाने में तैनात एएसआई राकेश सिंह तभी से लड़की पर बुरी नजर रखे हुए था। उसने लड़की के घर की रेकी की और 29 मार्च को उस वक्त का इंतजार किया जब वह घर में अकेली हो। आरोपी अधिकारी ने घर में घुसने के लिए ‘किराए पर कमरा लेने’ का बहाना बनाया। खाकी वर्दी देखकर परिवार ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके घर की दहलीज पार करने वाला व्यक्ति सुरक्षा देने वाला नहीं, बल्कि शिकार करने वाला शिकारी है।

सूनी दोपहर और वह खौफनाक मंजर: ऐसे बची मासूम की जान

घटना वाले दिन लड़की के पिता ऑटो चलाने गए थे और मां पास ही अपने मायके गई हुई थी। घर को सूना पाकर एएसआई राकेश सिंह जबरन अंदर दाखिल हो गया। उसने प्यास लगने का बहाना बनाकर पानी मांगा और जैसे ही लड़की पानी लाने मुड़ी, आरोपी ने अपनी मर्यादा लांघ दी। पीड़िता के अनुसार, आरोपी ने उसके साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी और दुष्कर्म करने की कोशिश की। खौफ के उस मंजर में भी नाबालिग ने हिम्मत नहीं हारी। खुद को दरिंदे के चंगुल से छुड़ाने के लिए वह भागकर घर की छत पर चली गई। छत खुली हुई थी और आस-पास के घरों से नजर आ रही थी। पकड़े जाने के डर और शोर मचने की आशंका से घबराकर आरोपी पुलिसवाला वहां से दबे पांव भाग निकला। अगर उस वक्त पीड़िता ने सूझबूझ न दिखाई होती, तो आज कहानी कुछ और ही भयानक होती।

अपनों का पहरा और पुलिस की ‘जांच-जांच’ का खेल

जब पीड़िता की मां वापस लौटी, तो उसने बिलखते हुए अपनी आपबीती सुनाई। इसके बाद मामला पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया। हैरानी की बात यह है कि आरोपी के खिलाफ उसी के थाने (बिछिया थाना) में केस तो दर्ज कर लिया गया है, लेकिन उसकी गिरफ्तारी को लेकर अब तक टालमटोल की जा रही है। मामले की जांच नगर पुलिस अधीक्षक (CSP) को सौंपी गई है। विभाग का कहना है कि वे तथ्यों की बारीकी से जांच कर रहे हैं। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब पुलिस अपने ही साथी को बचाने के लिए ‘जांच’ का सहारा ले रही है। नियम और कानून की दुहाई देने वाली पुलिस क्या एक अपराधी को सिर्फ इसलिए खुला छोड़ेगी क्योंकि वह उनकी बिरादरी का है?

न्याय की गुहार और सुलगते सवाल: क्या मिलेगी सजा?

पीड़ित परिवार अब न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। परिवार का सीधा और कड़वा सवाल है— “अगर यह हरकत किसी आम आदमी ने की होती, तो क्या पुलिस अब तक उसे जेल न भेज चुकी होती?” आरोपी अभी भी बाहर घूम रहा है, जो गवाहों और सबूतों को प्रभावित कर सकता है। रीवा पुलिस के लिए यह एक अग्निपरीक्षा है। क्या वे खाकी के रसूख को बचाएंगे या एक मासूम लड़की को इंसाफ दिलाएंगे? इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि थानों में महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है। जब तक एएसआई राकेश सिंह जैसे अपराधियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक आम आदमी का पुलिस पर से विश्वास उठना लाजमी है।

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