पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक चिंता के बीच केंद्र सरकार की ओर से बुलाए गए सर्वदलीय बैठक की शुरुआत सोमवार को हुई। इस बैठक का मकसद मिडिल ईस्ट में उत्पन्न मौजूदा संकट पर सभी राजनीतिक दलों की राय और सुझाव लेना है। बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कर रहे हैं और इसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर, गृहमंत्री अमित शाह, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी सहित कई केंद्रीय मंत्री और विपक्षी नेता मौजूद हैं। हालांकि, इस बैठक का सबसे बड़ा सस्पेंस यही है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने बैठक का बहिष्कार किया है, वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी केरल में अपने कार्यक्रम के कारण बैठक में शामिल नहीं हुए।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और बहिष्कार का कारण
TMC सांसद सौगत रॉय ने बैठक से अपने दल के बहिष्कार का कारण स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी पूरी लड़ाई भाजपा के खिलाफ है, इसलिए वे इस बैठक में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कहा, “हम किसी भी तरह की दिखावटी सर्वदलीय बैठकों में हिस्सा नहीं लेंगे, जब मुख्य उद्देश्य केवल भाजपा की शान बढ़ाना है।” वहीं, कांग्रेस ने भी बैठक में केवल कुछ प्रतिनिधियों को भेजा, क्योंकि राहुल गांधी पहले ही विदेश नीति और केंद्र की नीतियों पर सरकार को खुलकर घेरने की तैयारी कर रहे थे। इस बहिष्कार और गैरमौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में चर्चाओं को बढ़ा दिया है और विपक्षी दलों के बीच सियासी रणनीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैठक में चर्चा के मुद्दे और सरकार की तैयारी
सर्वदलीय बैठक में पश्चिम एशिया के हालात, तेल और गैस की आपूर्ति, एलपीजी संकट जैसी जरूरी सेवाओं और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों पर चर्चा की जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में पहले ही स्पष्ट किया था कि देश में तेल और गैस की कोई कमी नहीं है। इसके साथ ही सरकार ने सात नए अधिकार संपन्न समूहों का गठन किया है जो नियमित रूप से इन सभी क्षेत्रों का आकलन करेंगे और सुझाव देंगे। बैठक में बीजेडी, जेडीयू, सीपीआईएम और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी शामिल हैं और उनका मुख्य फोकस देश के हितों के अनुरूप सुरक्षा और आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
राजनीतिक हलचल और भविष्य की संभावनाएं
इस बैठक की सियासी महत्ता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि TMC का बहिष्कार और राहुल गांधी की गैरमौजूदगी विपक्ष के रणनीतिक फैसलों पर असर डाल सकती है। एनडीए नेताओं ने बैठक को जनता के हित में सही और आवश्यक बताया है। वे दावा कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टता दे चुके हैं और आने वाले फैसले देश के लिए फायदे मंद होंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक के परिणाम न केवल विदेशी नीति पर असर डालेंगे बल्कि घरेलू सियासत और विपक्षी दलों की रणनीति को भी प्रभावित करेंगे।
