मिडिल ईस्ट में चल रहा संघर्ष अब और गंभीर रूप लेता दिख रहा है। ईरान के खिलाफ बढ़ती सैन्य कार्रवाई के बीच लेबनान का सशस्त्र संगठन Hezbollah खुलकर मैदान में उतर आया है। नवंबर 2024 के सीजफायर समझौते के बाद यह पहला मौका है जब हिज्बुल्लाह ने सक्रिय रूप से जंग में भागीदारी की है। रिपोर्ट्स के अनुसार, संगठन ने लेबनान की जमीन से उत्तरी इजरायल की कई बस्तियों पर बड़े पैमाने पर रॉकेट दागे। इजरायली मीडिया में दावा किया गया कि हाइफा इलाके में कई रॉकेट सीधे गिरे, जिससे नुकसान हुआ और लोगों में दहशत फैल गई। हालांकि हिज्बुल्लाह ने आधिकारिक रूप से हर हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन उसकी सक्रियता ने पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। इजरायल ने साफ किया है कि उसे लेबनान सरकार से सीधी शिकायत नहीं है, लेकिन सीमा पार से हो रही फायरिंग को वह गंभीरता से ले रहा है।
अमेरिका की सीधी कार्रवाई, B2 बॉम्बर से हमला
तनाव के इस माहौल में अमेरिका ने भी अपनी सैन्य ताकत दिखाई है। अमेरिकी सेना ने United States Central Command (CENTCOM) के जरिए जानकारी दी कि उसने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाया है। इस ऑपरेशन में अत्याधुनिक B-2 Spirit स्टील्थ बॉम्बर्स का इस्तेमाल किया गया, जो 2,000 पाउंड के बमों से लैस थे। बताया गया कि इन विमानों ने ईरान के मजबूत और सुरक्षित ठिकानों पर सटीक हमले किए। अमेरिका ने हमले का वीडियो भी जारी किया, जिससे यह साफ संकेत मिला कि वह पीछे हटने के मूड में नहीं है। पिछले साल भी अमेरिका ने ईरान के अंडरग्राउंड परमाणु ठिकानों पर ऐसे ही विमानों से हमला किया था। इस बार विमानों ने किस बेस से उड़ान भरी, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम ईरान को सख्त संदेश देने की कोशिश है।
न्यूक्लियर टॉक्स की नई कोशिश, क्या निकलेगा रास्ता?
जहां एक तरफ जंग का माहौल है, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। ईरान के वरिष्ठ नेता Ali Larijani ने अमेरिका के साथ न्यूक्लियर बातचीत फिर से शुरू करने की कोशिश की है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लारीजानी ने अमेरिकी और अरब अधिकारियों से संपर्क साधा है। वे ईरान की राजनीति में प्रभावशाली चेहरा माने जाते हैं और पहले संसद के स्पीकर रह चुके हैं। मौजूदा हालात में, जब ईरान की नेतृत्व व्यवस्था में बदलाव की चर्चा है, लारीजानी की भूमिका और अहम हो गई है। उन्होंने पहले भी कहा था कि अगर अमेरिका की चिंता सिर्फ यह है कि ईरान परमाणु हथियार न बनाए, तो इस मुद्दे पर समझौते की गुंजाइश है। हालांकि जमीनी स्तर पर जारी हमले और जवाबी कार्रवाई बातचीत के रास्ते को मुश्किल बना रहे हैं।
क्या इस्लामिक देशों की एकजुटता से बदलेगा समीकरण?
ईरान के समर्थन में कुछ इस्लामिक संगठनों और देशों के बयान सामने आए हैं, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। तेल आपूर्ति, वैश्विक बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिकी एयरबेस और इजरायल पर हमलों की खबरों ने यह साफ कर दिया है कि संघर्ष कई मोर्चों पर फैल सकता है। फिलहाल हालात बेहद संवेदनशील हैं और हर देश अपने रणनीतिक कदम सोच-समझकर उठा रहा है। दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह टकराव बड़े युद्ध में बदलेगा या कूटनीति के जरिए कोई समाधान निकलेगा। आने वाले दिन इस पूरे क्षेत्र के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
Read More-जिस जगह बेटा रहता है, वहीं आकर गिरी मिसाइल… ईरान युद्ध के बीच लखनऊ के आमिर जैदी की दहशत भरी कहानी
