उत्तर प्रदेश की राजनीति और धार्मिक जगत में चल रहे विवाद के बीच शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को एक अहम समर्थन मिला है। शंकराचार्य सदानंद सरस्वती ने मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के सूखाखैरी ग्राम में आयोजित श्री रामचरितमानस एवं विष्णु यज्ञ कार्यक्रम के दौरान बिना नाम लिए उनका पक्ष लिया। अपने संबोधन में सदानंद सरस्वती ने कहा कि हमारे आचार्यों के प्रति ऐसा कोई व्यवहार नहीं होना चाहिए जिससे सनातन धर्म की गरिमा को ठेस पहुंचे। उन्होंने इशारों-इशारों में चल रहे विवाद पर चिंता जताई और कहा कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। उनके इस बयान को सीधे तौर पर अविमुक्तेश्वरानंद से जोड़कर देखा जा रहा है, जिनका नाम इन दिनों कई आरोपों के कारण सुर्खियों में है।
मंदिर प्रबंधन और धार्मिक स्वतंत्रता पर उठाए सवाल
सदानंद सरस्वती ने अपने संबोधन में देश में मंदिरों के सरकारी नियंत्रण का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कई हिंदू मंदिर सरकार के अधीन हैं, जबकि अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों पर ऐसा नियंत्रण नहीं है। उन्होंने इसे समानता के सिद्धांत के संदर्भ में प्रश्न के रूप में रखा। इसके साथ ही उन्होंने गौ रक्षा के मुद्दे पर भी टिप्पणी की और कहा कि इस विषय पर चल रहे आंदोलनों को दबाना या साजिश कहना उचित नहीं है। उनका कहना था कि सत्य को कुछ समय के लिए परेशान किया जा सकता है, लेकिन उसे पराजित नहीं किया जा सकता। उनके इन बयानों को धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं की रक्षा के पक्ष में मजबूत संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे और संतों के विचारों को ध्यान से सुन रहे थे।
आरोपों के बीच अविमुक्तेश्वरानंद की सफाई
दूसरी ओर, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे गंभीर आरोपों ने मामले को संवेदनशील बना दिया है। बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न से जुड़े मामले में उनका नाम सामने आने के बाद से जांच एजेंसियां सक्रिय हैं। गिरफ्तारी की आशंका के बीच उन्होंने उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दायर की है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि जांच प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और वे उसका सम्मान करते हैं। उनका यह भी कहना है कि इस मामले में तथ्यों को सामने आने दिया जाना चाहिए और किसी को भी जांच को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उन्होंने पुलिस पर जनता के भरोसे को लेकर भी टिप्पणी की और निष्पक्ष जांच की मांग दोहराई। फिलहाल अदालत में दायर याचिका पर सुनवाई का इंतजार है।
सियासत, धर्म और कानून—आगे क्या होगा?
यह मामला अब केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धार्मिक संस्थाओं, राजनीति और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन का विषय बन गया है। समर्थकों का कहना है कि संत समाज को बदनाम करने की कोशिश हो रही है, जबकि विरोधी पक्ष का मानना है कि कानून सबके लिए बराबर है और जांच निष्पक्ष होनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अदालत और जांच एजेंसियों की भूमिका सबसे अहम होती है। आने वाले दिनों में न्यायिक प्रक्रिया और जांच के नतीजे ही तस्वीर साफ करेंगे। फिलहाल सदानंद सरस्वती के समर्थन ने इस विवाद को नया मोड़ दे दिया है और धार्मिक व राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। सभी की नजर अब अदालत की कार्यवाही और जांच रिपोर्ट पर टिकी है।
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