Tuesday, February 24, 2026
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गिरफ्तारी को तैयार थे शंकराचार्य… अब हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत क्यों? अविमुक्तेश्वरानंद के ‘यू-टर्न’ से बढ़ी हलचल

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने यौन उत्पीड़न मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की है। झूंसी थाने में BNS और POCSO एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज है।

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धार्मिक जगत की चर्चित हस्ती स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने हाल के घटनाक्रम से नई बहस छेड़ दी है। कुछ समय पहले सार्वजनिक मंच से गिरफ्तारी के लिए तैयार होने की बात कहने वाले शंकराचार्य ने अब यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की है। यह याचिका उनके अधिवक्ताओं—राजर्षि गुप्ता, सुधांशु कुमार और श्री प्रकाश—के माध्यम से दायर की गई है। कोर्ट में इस पर जल्द सुनवाई होने की संभावना जताई जा रही है।

मामले की शुरुआत तब हुई जब तुलसी पीठाधीश्वर स्वामी रामभद्राचार्य के शिष्य आशुतोष ब्रह्मचारी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(4) के तहत जिला अदालत में अर्जी दाखिल की। इसके बाद एडीजे रेप एंड पॉक्सो स्पेशल कोर्ट, झूंसी ने पुलिस को मुकदमा दर्ज कर जांच का आदेश दिया। अदालत के निर्देश पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

 किन धाराओं में दर्ज हुआ मुकदमा?

झूंसी थाना पुलिस ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ उनके शिष्य मुकुंदानंद गिरी और दो-तीन अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351(3) और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) की धाराओं 5l, 6, 3, 4(2), 16 और 17 के तहत दर्ज की गई है।

POCSO एक्ट की धाराएं गंभीर मानी जाती हैं और इनमें कठोर सजा का प्रावधान है। पुलिस ने अदालत के आदेश के अनुपालन में केस दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है। जांच के दौरान संबंधित पक्षों से पूछताछ, साक्ष्यों का संग्रह और मेडिकल/डिजिटल साक्ष्यों की पड़ताल की जा सकती है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करना किसी भी आरोपी का अधिकार है, खासकर तब जब गिरफ्तारी की आशंका हो। कोर्ट यह देखेगा कि आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य और जांच की स्थिति क्या है।

अग्रिम जमानत पर क्या होगी बहस?

अग्रिम जमानत का अर्थ है कि यदि गिरफ्तारी की नौबत आए तो आरोपी को पहले से ही जमानत का संरक्षण मिल जाए। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष आरोपों की गंभीरता और जांच की जरूरतों पर जोर देगा, जबकि बचाव पक्ष गिरफ्तारी की आवश्यकता न होने और सहयोग की दलील दे सकता है।

यह भी देखा जाएगा कि क्या आरोपी जांच में सहयोग कर रहे हैं और क्या उनके खिलाफ prima facie साक्ष्य मौजूद हैं। अदालत पीड़ित पक्ष की बात भी सुनेगी और केस डायरी का अवलोकन कर सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने इसलिए भी ध्यान खींचा है क्योंकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि पुलिस कार्रवाई करती है तो वे गिरफ्तारी का विरोध नहीं करेंगे। अब अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करने को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

आगे की राह: जांच और अदालत का फैसला

फिलहाल पुलिस विवेचना जारी है और अदालत में अग्रिम जमानत पर सुनवाई की तारीख तय होना बाकी है। यदि हाईकोर्ट से राहत मिलती है तो गिरफ्तारी की स्थिति में उन्हें तत्काल जमानत का लाभ मिल सकता है। अगर राहत नहीं मिलती, तो पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

मामला संवेदनशील है और इसमें धार्मिक प्रतिष्ठा, कानून और सामाजिक विमर्श—तीनों आयाम जुड़े हैं। अदालत का निर्णय इस केस की दिशा तय करेगा। तब तक सभी पक्षों की नजर हाईकोर्ट की कार्यवाही पर टिकी है।

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो सकती है और अंतिम निष्कर्ष साक्ष्यों व गवाहों की विश्वसनीयता पर निर्भर करेगा। फिलहाल यह देखना अहम होगा कि हाईकोर्ट अग्रिम जमानत पर क्या रुख अपनाता है और जांच एजेंसियां आगे क्या कदम उठाती हैं।

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