मुर्शिदाबाद के बेलडांगा क्षेत्र में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कलकत्ता हाई कोर्ट में दायर ताज़ा जनहित याचिका में दावा किया गया है कि मस्जिद का शिलान्यास जिला प्रशासन या किसी भी स्थानीय निकाय से आवश्यक अनुमति लिए बिना ही कर दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना को लेकर किसी प्रकार का प्रशासनिक क्लीयरेंस मौजूद नहीं है, फिर भी सार्वजनिक भूमि पर निर्माण का ऐलान कर दिया गया। यह आरोप सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है कि आखिर ऐसी संवेदनशील परियोजना को लेकर अनुमति प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया गया।
बाबरी मस्जिद विवाद की छाया में नया मामला
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही मूल बाबरी मस्जिद विवाद पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुना चुका है, जिसके बाद देशभर में शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की गई थी। लेकिन अब नए सिरे से ‘बाबरी मस्जिद’ नाम पर निर्माण की घोषणा कर माहौल को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि बिना अनुमति की गई गतिविधियों की जांच कराई जाए, ताकि किसी प्रकार का सांप्रदायिक तनाव न फैले। कोर्ट में जल्द ही इस याचिका पर सुनवाई की उम्मीद है, जिससे यह मामला और अधिक सुर्खियों में आ सकता है।
निलंबित विधायक ने किया था 300 करोड़ की मस्जिद का ऐलान
ध्यान देने वाली बात यह है कि यह विवाद तब शुरू हुआ जब छह दिसंबर को तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने बेलडांगा में मस्जिद निर्माण का शिलान्यास किया। उन्होंने करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से एक भव्य मस्जिद बनाने की घोषणा की थी। यह कार्यक्रम सार्वजनिक रूप से आयोजित किया गया और वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए। हालांकि विरोधियों का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना बिना किसी सरकारी स्वीकृति के शुरू नहीं हो सकती। अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर इतने बड़े धार्मिक ढांचे की नींव किस आधार पर रखी गई और इसे वैध अनुमति क्यों नहीं मिली।
कोर्ट के फैसले से तय होगा आगे का रास्ता
मामले पर याचिका दायर होने के बाद स्थानीय प्रशासन भी सतर्क हो गया है। अधिकारियों का कहना है कि वे हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार आगे की कार्रवाई करेंगे। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अनुमति नहीं ली गई है, तो शिलान्यास कार्यक्रम को अवैध माना जा सकता है। इसके अलावा, यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील बन गया है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में लंबे समय से धार्मिक मुद्दे राजनीतिक बहस का केंद्र रहे हैं। अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि हाई कोर्ट क्या टिप्पणी करता है और क्या मस्जिद निर्माण के इस विवाद पर रोक या जांच के आदेश दिए जाते हैं। आने वाले दिनों में यह मामला राज्य की राजनीति और सामाजिक माहौल पर बड़ा असर डाल सकता है।
