उत्तर प्रदेश (UP) सरकार ने मदरसों में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर बड़ा फैसला लेते हुए घोषणा की है कि अब सभी सरकारी मदरसों में टीचर भर्ती कमीशन के माध्यम से की जाएगी। इस फैसले के बाद मदरसा मैनेजमेंट कमेटियों का वर्षों से चला आ रहा पूर्ण अधिकार समाप्त हो जाएगा और चयन की प्रक्रिया सरकारी नियंत्रण में आ जाएगी। सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था पारदर्शिता बढ़ाएगी और योग्य उम्मीदवारों को अवसर मिलेगा। लेकिन मदरसा संचालकों और कई अल्पसंख्यक संगठनों ने इस निर्णय को अल्पसंख्यकों की धार्मिक–शैक्षणिक संस्थाओं पर हस्तक्षेप बताया है। उनका कहना है कि यह फैसला संविधान में दिए गए उनके अधिकारों के खिलाफ है।
अब तक कैसे होती थी मदरसों में शिक्षकों की नियुक्ति?
मदरसों में अब तक शिक्षकों की भर्ती पूरी तरह मैनेजमेंट कमेटियों के अधिकार क्षेत्र में होती थी। कमेटियां अपनी जरूरत के अनुसार टीचरों के पद तय करती थीं और स्थानीय स्तर पर इंटरव्यू लेकर नियुक्ति कर देती थीं। योग्यता का निर्धारण भी वही करते थे, इसलिए किसी प्रतियोगी परीक्षा या विशेष ट्रेनिंग की अनिवार्यता नहीं होती थी। कई बार यह आरोप भी लगाए जाते थे कि नियुक्तियों में पारदर्शिता नहीं रहती और मैनेजमेंट कमेटियां अपने परिचित लोगों को ही नौकरी दे देती हैं। इसी ढीली व्यवस्था के चलते कई शिक्षक बिना किसी प्रतियोगी परीक्षा, ट्रेनिंग या प्रोफेशनल कौशल के ही नौकरी हासिल कर लेते थे। लेकिन वेतनमान बेहद आकर्षक था—कई मदरसों में गैर-प्रशिक्षित शिक्षक भी 50 हजार से 90 हजार रुपये तक मासिक वेतन पा रहे थे।
सरकार का तर्क—पारदर्शिता और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की कोशिश
सरकार का कहना है कि जब शिक्षक सरकारी वेतनमान का लाभ उठा रहे हैं, तो नियुक्ति भी पारदर्शी और योग्यता आधारित होनी चाहिए। नए नियम के बाद उम्मीदवारों को आयोग की परीक्षा पास करनी होगी, जिसमें विषय ज्ञान, शिक्षण कौशल और पात्रता की जांच की जाएगी। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी और मदरसों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का प्रयास तेज होगा। इसके अलावा, उनके अनुसार मैनेजमेंट कमेटियों द्वारा मनमानी नियुक्तियों पर रोक लगेगी और मदरसों को वह प्रशासनिक संरचना मिलेगी जो सामान्य शैक्षणिक संस्थानों में होती है। अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि आयोग के नियंत्रण में भर्ती होने से भ्रष्टाचार की संभावनाएं कम होंगी और शिक्षक नियुक्ति पूरी तरह मेरिट पर तय होगी।
मदरसा संचालकों का आरोप
सरकार के दावों के बावजूद मदरसा संचालकों और अनेक संगठनों का कहना है कि यह निर्णय अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों पर सीधा हमला है। उनका तर्क है कि मदरसे धार्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा देने वाली संस्थाएं हैं, जिन्हें संविधान अनुच्छेद 29 और 30 के तहत अपना प्रबंधन खुद करने का अधिकार प्राप्त है। वे मानते हैं कि नियुक्ति प्रक्रिया को आयोग के हाथों में देना इस अधिकार का हनन है, क्योंकि शिक्षक वही होना चाहिए जिसे संस्था अपने पाठ्यक्रम और धार्मिक शिक्षण के अनुरूप चुन सके। संचालकों का यह भी कहना है कि सरकार का यह कदम मदरसों को सरकारी ढांचे में बांधने और उनकी पहचान मिटाने की कोशिश है। विरोधियों ने चेतावनी दी है कि यदि यह प्रस्ताव लागू किया गया तो वे न्यायिक लड़ाई भी लड़ने के लिए तैयार हैं।
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