सूर्य और चंद्र ग्रहण को भारतीय शास्त्रों और पुराणों में अशुभ काल माना गया है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान राहु और केतु का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा फैलती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार ग्रहण काल में पवित्र और शुभ कार्यों से परहेज करने की सलाह दी जाती है। खासतौर पर मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्रों में उल्लेख है कि पति-पत्नी को भी इस समय शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए, क्योंकि यह काल मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से अशुभ माना गया है।
स्वास्थ्य पर असर और आयुर्वेद की चेतावनी
आयुर्वेद के अनुसार ग्रहण के दौरान शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इस समय बनी शारीरिक नजदीकियां मानसिक असंतुलन और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि ग्रहण काल की नकारात्मक ऊर्जा शरीर और मन दोनों को प्रभावित करती है, जिससे संबंध बनाने से दंपतियों पर शारीरिक और मानसिक नुकसान हो सकता है।
गर्भधारण और संतानों पर संभावित प्रभाव
पुराणों में उल्लेख है कि ग्रहण के दौरान बने संबंधों से गर्भधारण होने पर शिशु पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान गर्भ धारण करने वाले बच्चे में शारीरिक या मानसिक विकारों की संभावना अधिक रहती है। इसी कारण से शास्त्रों में दंपतियों को ग्रहण काल में संयम बरतने और शुभ कार्यों से दूरी रखने की सलाह दी जाती है।
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