पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी उठापटक थमती नजर नहीं आ रही है। एक हफ्ते के भीतर पार्टी के तीसरे राज्यसभा सांसद ने इस्तीफा देकर राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। ताजा मामला राज्यसभा सांसद प्रकाश बराइक का है, जिन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। इससे पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर राय और सांसद सुष्मिता देव भी राज्यसभा की सदस्यता छोड़ चुके हैं। लगातार हो रहे इस्तीफों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पार्टी के भीतर ऐसा क्या चल रहा है, जिसकी वजह से बड़े नेता एक-एक कर किनारा करते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक जानकार इसे टीएमसी के लिए एक बड़े झटके के रूप में देख रहे हैं।
कौन हैं प्रकाश बराइक और क्यों माना जाता है उन्हें अहम चेहरा?
प्रकाश बराइक तृणमूल कांग्रेस के पुराने और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। खास तौर पर उत्तर बंगाल और आदिवासी समुदाय के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। राजनीति में आने से पहले वे चाय बागान कर्मचारियों और मजदूरों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहे थे। इसी कारण जमीनी स्तर पर उनकी अलग पहचान बनी। पार्टी नेतृत्व ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें राज्यसभा भेजा था। राजनीतिक हलकों में उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीबी नेताओं में भी शामिल माना जाता रहा है। ऐसे में उनका इस्तीफा केवल एक सांसद का पद छोड़ना नहीं, बल्कि पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। हालांकि उन्होंने इस्तीफे के पीछे की वजह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं की है, लेकिन उनके फैसले ने कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है।
लगातार इस्तीफों से पार्टी में बढ़ी असंतोष की चर्चा
प्रकाश बराइक से पहले सुखेंदु शेखर राय और सुष्मिता देव भी राज्यसभा छोड़ चुके हैं। सुखेंदु शेखर राय लंबे समय तक ममता बनर्जी के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे हैं। उनके इस्तीफे के बाद ही पार्टी के अंदर असंतोष की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। वहीं सुष्मिता देव के इस्तीफे ने इन चर्चाओं को और तेज कर दिया। उनके इस्तीफे के बाद अन्य राजनीतिक दलों से संपर्क की खबरें भी सामने आईं, जिससे राजनीतिक समीकरणों को लेकर अटकलें बढ़ गईं। दूसरी ओर लोकसभा में भी पार्टी के कुछ सांसदों द्वारा अलग रुख अपनाने की खबरों ने टीएमसी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। लगातार सामने आ रहे घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है और कई नेता नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं।
क्या बंगाल चुनाव में हार के बाद बढ़ा दबाव?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं होने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा है। चुनावी नतीजों के बाद संगठन को मजबूत बनाए रखने की चुनौती नेतृत्व के सामने खड़ी हुई है। कई नेताओं और कार्यकर्ताओं का मानना है कि पार्टी को नए सिरे से रणनीति बनाने की जरूरत है। लगातार हो रहे इस्तीफों से यह भी साफ है कि आने वाले समय में टीएमसी के सामने संगठनात्मक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। फिलहाल पार्टी नेतृत्व की ओर से इन घटनाओं पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन विपक्ष इन इस्तीफों को ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल के रूप में पेश कर रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या पार्टी इन झटकों से उबर पाएगी या आने वाले दिनों में और बड़े राजनीतिक बदलाव देखने को मिलेंगे।
