उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी बीच कासगंज विधानसभा सीट पर भी सियासी मुकाबले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। कभी समाजवादी पार्टी का मजबूत क्षेत्र मानी जाने वाली इस सीट पर पिछले दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने जीत दर्ज की है। अब सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव की PDA रणनीति यहां बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगा पाएगी या बीजेपी एक बार फिर अपनी जीत दोहराएगी? पिछले चुनावों के नतीजे, जातीय समीकरण और मतदाताओं के बदलते रुझान इस मुकाबले को दिलचस्प बनाते हैं।
कभी सपा का प्रभाव, अब बीजेपी का दबदबा; क्या 2027 में बदलेगा समीकरण?
कासगंज उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीट संख्या 100 है। यहां लोधी मतदाताओं की संख्या काफी मानी जाती है, जबकि शाक्य, बघेल, यादव और मुस्लिम समुदाय के मतदाता भी चुनावी नतीजे तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस सीट से पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी 1993 में विधायक रह चुके हैं। चुनावी इतिहास देखें तो बीजेपी ने 1991, 1993 और 1996 में जीत हासिल की, लेकिन इसके बाद पार्टी को लंबे समय तक सफलता नहीं मिली। समाजवादी पार्टी ने 2002 और 2012 में यहां जीत दर्ज की, जबकि 2007 में बसपा भी इस सीट पर कब्जा जमा चुकी है। बीजेपी ने 2017 और 2022 में लगातार जीत हासिल कर अपना आधार मजबूत किया। ऐसे में 2027 में सपा के सामने पुराना जनाधार वापस पाने की चुनौती होगी।
2022 में बीजेपी ने सपा को करीब 46 हजार वोटों से हराया
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के देवेंद्र सिंह राजपूत ने कासगंज सीट से जीत दर्ज की थी। समाजवादी पार्टी ने पूर्व विधायक मानपाल सिंह को मैदान में उतारा था। चुनाव में बीजेपी को 1,23,410 वोट मिले, जबकि सपा को 77,145 वोट हासिल हुए। बसपा के मोहम्मद आरिफ को 23,001 और कांग्रेस के कुलदीप कुमार को 5,951 वोट मिले। इस तरह बीजेपी ने सपा को लगभग 46 हजार वोटों के अंतर से हराया। दोनों प्रमुख दलों ने लोधी समाज से उम्मीदवार उतारे थे। चुनावी विश्लेषण के मुताबिक, बीजेपी को लोधी, शाक्य, बघेल और कई अन्य समुदायों का समर्थन मिला, जबकि सपा को यादव और मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा हासिल हुआ। हालांकि, जातिवार वोटों के ये आकलन अनुमान हैं, आधिकारिक मतगणना में समुदाय के हिसाब से वोट दर्ज नहीं किए जाते।
2024 लोकसभा चुनाव में घटा जीत का अंतर, सपा को मिली राहत
2024 के लोकसभा चुनाव में कासगंज विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी और सपा के बीच मुकाबला पहले से ज्यादा नजदीकी रहा। बीजेपी को 1,13,678 वोट मिले, जबकि सपा को 90,238 वोट हासिल हुए। बसपा के खाते में 17,670 वोट आए। इस बार बीजेपी की जीत का अंतर करीब 23 हजार वोट रहा, जो 2022 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले लगभग आधा था। इस नतीजे को सपा के लिए उम्मीद के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। चुनावी विश्लेषण में शाक्य, यादव और मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को सपा के बेहतर प्रदर्शन की वजह माना गया। वहीं बीजेपी को लोधी, ठाकुर, ब्राह्मण और बनिया मतदाताओं के समर्थन से फायदा मिलने की बात कही गई। हालांकि, लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे अलग हो सकते हैं, इसलिए इन आंकड़ों से 2027 का नतीजा तय मानना सही नहीं होगा।
लोधी, शाक्य, बघेल और अति पिछड़े मतदाता बन सकते हैं निर्णायक
कासगंज के जातीय समीकरण में लोधी मतदाताओं की संख्या लगभग 80 हजार बताई जाती है। इसके अलावा अनुसूचित जाति के करीब 50 हजार, यादव और मुस्लिम समुदाय के लगभग 40-40 हजार तथा शाक्य समुदाय के करीब 25 हजार मतदाताओं का अनुमान है। बघेल, ठाकुर, निषाद और बनिया समुदाय भी चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ये आंकड़े अनुमानित हैं और मतदाता सूची में जाति के आधार पर आधिकारिक विभाजन उपलब्ध नहीं होता। अखिलेश यादव की PDA रणनीति के सामने चुनौती यह होगी कि सपा अपने पारंपरिक समर्थकों के साथ दूसरे पिछड़े और दलित समुदायों का कितना समर्थन जुटा पाती है। दूसरी ओर बीजेपी के लिए अपने मौजूदा सामाजिक समर्थन को बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। आखिरकार उम्मीदवार का चयन, स्थानीय समस्याएं, विकास कार्य और चुनावी मुद्दे ही तय करेंगे कि 2027 में कासगंज का राजनीतिक पलड़ा किस ओर झुकता है।
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