पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक साथ दो अलग-अलग तस्वीरें देखने को मिल रही हैं, जिसने राजनीतिक गलियारों में सस्पेंस गहरा दिया है। एक तरफ तृणमूल कांग्रेस (TMC) की मुखिया ममता बनर्जी दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठकों में व्यस्त हैं और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से उनके आवास पर मुलाकात कर रही हैं, तो दूसरी तरफ कोलकाता में उनके अपने घर पर पुलिसिया कार्रवाई ने हड़कंप मचा दिया है। दरअसल, जिस वक्त ममता दिल्ली में सोनिया गांधी से गर्मजोशी से मिल रही थीं, ठीक उसी समय कोलकाता के ’30 बी हरीश चटर्जी स्ट्रीट’ स्थित ममता बनर्जी के आवास पर सीआईडी (CID) की एक टीम धमक पड़ी। बताया जा रहा है कि सीआईडी की यह टीम ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी के कद्दावर नेता अभिषेक बनर्जी को एक मामले में नोटिस तामिल कराने पहुंची थी। दोनों बड़े नेताओं के दिल्ली में होने के बावजूद कोलकाता में हुई इस अचानक कार्रवाई से बंगाल की सियासत का पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
क्या है ‘फर्जी सिग्नेचर’ का वो विवाद, जिसने हिला दी टीएमसी की नींव?
आखिर ऐसा क्या हुआ कि बंगाल पुलिस की सीआईडी को खुद मुख्यमंत्री के घर का दरवाजा खटखटाना पड़ा? इस पूरे मामले की जड़ में विधानसभा चुनाव के बाद की एक कथित इनसाइड स्टोरी है। दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद टीएमसी विधायक दल ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को सदन में नेता प्रतिपक्ष (LOP) बनाने का फैसला किया था। इस फैसले के समर्थन में 70 विधायकों के हस्ताक्षर वाली एक लिस्ट अभिषेक बनर्जी ने विधानसभा अध्यक्ष को सौंपी थी। विवाद तब शुरू हुआ जब पार्टी के ही दो विधायकों—ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा—ने अचानक यह दावा ठोक दिया कि इस लिस्ट में विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी हैं। उनका आरोप था कि कई विधायकों की मर्जी के बिना उनके जाली दस्तखत किए गए। इस गंभीर शिकायत के बाद विधानसभा सचिवालय की तरफ से एक आधिकारिक एफआईआर (FIR) दर्ज कराई गई, जिसकी कमान अब राज्य की सीआईडी के हाथों में है और सुई सीधे अभिषेक बनर्जी पर टिकी हुई है।
जांच के घेरे में अभिषेक बनर्जी और कानूनी दांवपेंच का खेल
सीआईडी इस समय पूरी मुस्तैदी से इस बात की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है कि विधानसभा अध्यक्ष को सौंपी गई वो चिट्ठी वाकई फर्जी थी या नहीं, और अगर थी तो वो जाली दस्तखत किसने और किसके कहने पर किए थे। चूंकि वो विवादित पत्र खुद अभिषेक बनर्जी ने आगे बढ़ाया था, इसलिए जांच का मुख्य केंद्र बिंदु वही बने हुए हैं। सीआईडी अब तक इस मामले में कई विधायकों के बयान दर्ज कर चुकी है और अभिषेक बनर्जी को नोटिस देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। दूसरी तरफ, कानूनी शिकंजे से बचने के लिए अभिषेक बनर्जी ने भी पलटवार करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, ताकि इन समनों और कार्रवाइयों पर रोक लगाई जा सके। अब देखना यह है कि अदालत से उन्हें इस मामले में राहत मिलती है या जांच एजेंसी की सख्ती और बढ़ने वाली है।
साजिश का आरोप, बगावत की बू और टीएमसी के भीतर बड़ी टूट के संकेत
इस पूरे घटनाक्रम पर तृणमूल कांग्रेस का रुख बेहद आक्रामक है। पार्टी ने इसे एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश करार दिया है और सीधे तौर पर विपक्षी नेता सुवेंदु अधिकारी पर निशाना साधा है। टीएमसी का कहना है कि सुवेंदु जानबूझकर ममता और अभिषेक बनर्जी की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए इस मामले को तूल दे रहे हैं। हालांकि, पार्टी के भीतर की स्थिति भी ठीक नहीं लग रही है। जिन दो विधायकों ने फर्जी हस्ताक्षर के आरोप लगाए थे, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता तो दिखा दिया गया है, लेकिन नुकसान की भरपाई होना मुश्किल लग रहा है। खबरें गर्म हैं कि ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा तैयार कर लिया है और 80 में से लगभग 60 विधायक उनके खेमे में जा चुके हैं। इतना ही नहीं, कयास तो यह भी हैं कि पार्टी के 20 से अधिक सांसद भी अब अपनी अलग राह चुनने की तैयारी में हैं, जिसने टीएमसी की अंदरूनी चिंताएं बेहद बढ़ा दी हैं।
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