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इंदौर का ‘भूतिया’ सरकारी अस्पताल: न जमीन मिली, न भवन बना… फिर 6 साल से किस आधार पर हो रही थीं यहां नियुक्तियां?

इंदौर में कागजों पर चल रहे 50 बेड के 'भूतिया' सिविल अस्पताल का चौंकाने वाला सच। बिना जमीन और भवन के 6 साल से हो रही नियुक्तियां और तबादले।

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मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के खजराना, मुसाखेड़ी, तेजाजी नगर और बिचौली हप्सी जैसे घने इलाकों की करीब तीन लाख से अधिक आबादी आज भी एक अदद सरकारी अस्पताल के लिए तरस रही है। स्थानीय निवासियों को सामान्य इलाज के लिए भी मीलों दूर एमवाय अस्पताल, एमटीएच या जिला अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते हैं। दरअसल, छह साल पहले क्षेत्र की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए एक अर्बन पीएससी को 50 बेड के सिविल अस्पताल में अपग्रेड करने की मंजूरी दी गई थी। उम्मीद थी कि इससे बड़े अस्पतालों पर मरीजों का बोझ कम होगा, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। सालों बीत जाने के बाद भी यहां न तो ईंट रखी गई और न ही कोई इमारत खड़ी हुई, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में यह अस्पताल पूरी तरह ‘सक्रिय’ नजर आ रहा है।

सरकार की दलील: ‘पद स्वीकृत हैं, पर जमीन गायब है’

जब इस अजीबोगरीब मामले ने तूल पकड़ा, तो प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने सरकार का पक्ष रखते हुए एक चौंकाने वाली बात कही। उन्होंने माना कि छह साल पहले इस अस्पताल को मंजूरी तो मिली थी, लेकिन शहरी क्षेत्र में उपयुक्त जमीन न मिल पाने के कारण इसका निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका। मंत्री के मुताबिक, अस्पताल के लिए जो पद स्वीकृत किए गए थे, वे सरकारी पोर्टल पर लगातार दिखाई दे रहे हैं। चूंकि अस्पताल का भवन तैयार नहीं है, इसलिए वहां के पैरामेडिकल स्टाफ और कर्मचारियों को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) के निर्देश पर आस-पास की संजीवनी क्लीनिकों में अटैच कर दिया गया है। सरकार अब भी 50 बेड के इस अस्पताल के लिए उपयुक्त जमीन की तलाश में जुटी हुई है।

अधिकारियों का दावा: संजीवनी क्लीनिकों के सहारे चल रही व्यवस्था

इस पूरे मामले पर इंदौर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव हसानी का कहना है कि घने शहरी इलाकों में सरकारी जमीन का कब्जा मिलना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। भूमि आवंटन में हो रही देरी की वजह से ही निर्माण कार्य अधर में लटका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस स्वीकृत अस्पताल के कर्मचारियों को बेकार नहीं बैठने दिया गया, बल्कि उन्हें जिले के अन्य स्वास्थ्य केंद्रों और संजीवनी क्लीनिकों में तैनात किया गया है। डॉ. हसानी ने जानकारी दी कि वर्तमान में इंदौर में 84 संजीवनी क्लीनिक संचालित हो रहे हैं, जिनमें से 71 में मेडिकल ऑफिसर और आउटसोर्स के जरिए कंप्यूटर ऑपरेटर व सपोर्ट स्टाफ दिए गए हैं। शासन के निर्देशों के अनुसार, जब तक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) द्वारा स्थायी स्टाफ की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक स्थानीय स्तर पर ही इन अस्पतालों का काम चलाया जा रहा है।

विपक्ष हमलावर: ‘यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि बड़ा घोटाला है’

दूसरी ओर, इस मामले को लेकर प्रदेश की सियासत पूरी तरह गरमा गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे एक बड़ा प्रशासनिक घोटाला करार दिया है। पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने सरकार को घेरते हुए कहा कि जिस अस्पताल का धरातल पर कोई वजूद ही नहीं है, वहां के नाम पर छह सालों से लगातार नियुक्तियां और तबादले करना बेहद गंभीर अनियमितता है। कांग्रेस ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है और चेतावनी दी है कि आगामी विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को पूरी ताकत से उठाया जाएगा। इधर, स्थानीय जनता में भी भारी आक्रोश है। लोगों का सीधा सवाल है कि जब अस्पताल का कोई ढांचा ही तैयार नहीं हुआ, तो इतने सालों से ट्रांसफर-पोस्टिंग का यह खेल किसके फायदे के लिए और किस आधार पर खेला जा रहा है?

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