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रसोई गैस पर सरकार का बड़ा एक्शन: रिलायंस समेत 21 कंपनियों को मिला प्रोडक्शन का नया टार्गेट, जानें क्या होगा असर?

रसोई गैस की किल्लत दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 21 रिफाइनरियों के लिए LPG प्रोडक्शन कोटा तय किया है।

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भारत में रसोई गैस (LPG) की बढ़ती खपत और आयात पर निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पहली बार देश की 21 प्रमुख रिफाइनरियों और अपस्ट्रीम कंपनियों के लिए एलपीजी उत्पादन का दैनिक कोटा निर्धारित कर दिया है। 13 अगस्त 2026 को जारी इस आदेश के तहत कुल 63,810 टन प्रतिदिन के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। यह आंकड़ा वित्त वर्ष 2026 में भारत के घरेलू एलपीजी उत्पादन से दोगुने से भी अधिक है और देश की रोजाना की कुल खपत का लगभग 70 फीसदी हिस्सा कवर करता है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि यदि रिफाइनरियां अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग करें, तो आयात पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।

रिलायंस को मिली सबसे बड़ी जिम्मेदारी, नायरा और ONGC भी शामिल

सरकार द्वारा तय किए गए इन लक्ष्यों में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा रिलायंस इंडस्ट्रीज के खाते में आया है, जिसकी जामनगर स्थित DTA रिफाइनरी को 18,000 टन प्रतिदिन एलपीजी उत्पादन का टार्गेट दिया गया है। इसके अलावा, रोसनेफ्ट समर्थित नायरा एनर्जी की वाडीनार रिफाइनरी को 4,480 टन प्रतिदिन का लक्ष्य मिला है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भी इस लक्ष्य का अहम हिस्सा बनाया गया है, जहाँ ओएनजीसी और गेल को मिलाकर कुल 6,460 टन प्रतिदिन का उत्पादन करने के निर्देश दिए गए हैं। यह एक सोची-समझणी रणनीति का हिस्सा है ताकि उत्पादन को विकेंद्रीकृत करके आपूर्ति श्रृंखला को सुव्यवस्थित किया जा सके और किसी भी आपातकालीन स्थिति में गैस की किल्लत न हो।

क्यों पड़ी इस बड़े फैसले की जरूरत? आयात का गणित और संकट की चुनौतियां

इस फैसले के पीछे का सबसे बड़ा कारण भारत की एलपीजी आयात पर भारी निर्भरता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2026 में भारत ने लगभग 3.32 करोड़ टन एलपीजी की खपत की, जो औसतन 91,000 टन प्रतिदिन के बराबर है। इसमें से मात्र 1.31 करोड़ टन घरेलू स्तर पर उत्पादित हो पाया, जबकि 2.13 करोड़ टन का आयात करना पड़ा। यानी भारत अपनी कुल जरूरत का 64 फीसदी से अधिक हिस्सा दूसरे देशों से मंगाता है, जिससे न केवल विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है। मार्च में आए सप्लाई संकट के दौरान सरकार ने रिफाइनरियों को पेट्रोकेमिकल स्ट्रीम मोड़ने का निर्देश दिया था, जिसने उस समय राहत दी थी। अब सरकार उसी प्रक्रिया को एक स्थायी और अनिवार्य ढांचे में ढाल रही है।

सिर्फ प्रोडक्शन ही नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत करने की तैयारी

सरकार की यह पहल केवल उत्पादन के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार की योजना भी है। मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि इन कंपनियों को सिर्फ एलपीजी बनाना ही नहीं है, बल्कि उसके सुरक्षित स्टोरेज, निकासी और ट्रांसपोर्टेशन के लिए भी समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे हर समय मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए तैयार रहें। जरूरत पड़ने पर सरकार किसी भी समय उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष निर्देश जारी कर सकती है। इस कदम से न केवल घरेलू बाजार में रसोई गैस की उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि भविष्य में होने वाले किसी भी संभावित सप्लाई संकट का सामना करने के लिए भारत पहले से कहीं अधिक तैयार होगा। सरकार की इस रणनीति का सीधा लाभ आने वाले समय में आम जनता को मिलेगा, जिससे गैस सिलेंडर की समय पर डिलीवरी और आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी।

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