मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश और नमाज पढ़ने के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर अहम सुनवाई हुई। इस दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इस्लाम महिलाओं को मस्जिद जाने से नहीं रोकता, लेकिन उनके लिए घर पर नमाज पढ़ना ज्यादा बेहतर माना जाता है। यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने की अनुमति देने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान से सुना और कई अहम सवाल भी उठाए।
बोर्ड की दलील—घर पर नमाज भी बराबर
बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील एम. आर. शमशाद ने संविधान पीठ को बताया कि इस्लाम में कुछ नियमों के साथ महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने की अनुमति है, लेकिन उन्हें घर पर नमाज पढ़ने पर भी उतना ही धार्मिक फल मिलता है। उन्होंने कहा कि मस्जिद में ‘गर्भगृह’ जैसी कोई व्यवस्था नहीं होती और धार्मिक प्रथाओं को समझने का अधिकार धार्मिक विद्वानों को होना चाहिए, न कि अदालत को। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है, इसलिए धार्मिक परंपराओं की व्याख्या उसी समुदाय के विशेषज्ञों पर छोड़नी चाहिए।
जजों के सवाल—व्यवस्था और जिम्मेदारी पर चर्चा
सुनवाई के दौरान जजों ने भी कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि अगर घर के सभी लोग मस्जिद चले जाएंगे, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा? वहीं जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि इस्लाम में महिलाओं के लिए मस्जिद में नमाज पढ़ना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वह हर विचार का सम्मान करता है, लेकिन केवल सोशल मीडिया या बिना प्रमाण वाली जानकारी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस दौरान धार्मिक परंपराओं और समानता के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर भी चर्चा हुई।
बड़े फैसले की ओर बढ़ रही सुनवाई
यह मामला सिर्फ मस्जिदों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में सबरीमाला मंदिर का मामला भी चर्चा में आया, जहां पहले महिलाओं के प्रवेश को लेकर बड़ा फैसला दिया जा चुका है। अब नौ जजों की संविधान पीठ इस पूरे मुद्दे पर विस्तार से सुनवाई कर रही है और आने वाले दिनों में इसका असर कई धार्मिक प्रथाओं पर पड़ सकता है। अगली सुनवाई 28 अप्रैल को होगी, जिसमें इस बहस को आगे बढ़ाया जाएगा।
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